धरती कर रही है पुकार: अब भी न जागे तो….
धरती कर रही है पुकार: अब भी न जागे तो….
(5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस)
“सूखी नदियाँ, कटा हुआ वन,
दम घुटता है इस हरियाली के बिन।
अब भी न जागे, तो होगा अंधकार,
धरती रो रही है—सुन उसकी पुकार!”
"धरती हमारी मां है", यह वाक्य अब केवल पुस्तकों और भाषणों में ही अच्छा लगता है। व्यवहार में देखें तो आज हम उसी धरती माता को छलनी करने में लगे हैं। हर दिन बढ़ता तापमान, सिकुड़ते जंगल, सूखती नदियां, और दम तोड़ती प्रजातियां हमारी संवेदनहीनता की गवाही दे रही हैं। पर्यावरण दिवस (5 जून) पर जब हम 'ग्रीन ड्रेस' पहनकर फोटो पोस्ट करते हैं, क्या कभी इस बात पर ध्यान दिया कि यह दिन धरती की करुण पुकार का प्रतीक है? आज समय आ गया है जब हमें सिर्फ देखने या जानने से आगे बढ़कर करने की दिशा में चलना होगा। क्योंकि अब भी न जागे तो बहुत देर हो जाएगी।
प्रकृति का बिगड़ता संतुलन: धरती का पर्यावरण संतुलन सदियों से प्राकृतिक चक्रों पर निर्भर रहा है। पेड़-पौधे, जल, वायु, मृदा, वन्य जीव—इन सबका अपना एक सजीव और परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र है। किंतु औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और भौतिकवाद ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। आ...