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धरती कर रही है पुकार: अब भी न जागे तो….

धरती कर रही है पुकार: अब भी न जागे तो…. (5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस) “सूखी नदियाँ, कटा हुआ वन, दम घुटता है इस हरियाली के बिन। अब भी न जागे, तो होगा अंधकार, धरती रो रही है—सुन उसकी पुकार!” "धरती हमारी मां है", यह वाक्य अब केवल पुस्तकों और भाषणों में ही अच्छा लगता है। व्यवहार में देखें तो आज हम उसी धरती माता को छलनी करने में लगे हैं। हर दिन बढ़ता तापमान, सिकुड़ते जंगल, सूखती नदियां, और दम तोड़ती प्रजातियां हमारी संवेदनहीनता की गवाही दे रही हैं। पर्यावरण दिवस (5 जून) पर जब हम 'ग्रीन ड्रेस' पहनकर फोटो पोस्ट करते हैं, क्या कभी इस बात पर ध्यान दिया कि यह दिन धरती की करुण पुकार का प्रतीक है? आज समय आ गया है जब हमें सिर्फ देखने या जानने से आगे बढ़कर करने की दिशा में चलना होगा। क्योंकि अब भी न जागे तो बहुत देर हो जाएगी। प्रकृति का बिगड़ता संतुलन: धरती का पर्यावरण संतुलन सदियों से प्राकृतिक चक्रों पर निर्भर रहा है। पेड़-पौधे, जल, वायु, मृदा, वन्य जीव—इन सबका अपना एक सजीव और परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र है। किंतु औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और भौतिकवाद ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। आ...

सरदार वल्लभ भाई पटेल एक लौह पुरुष

सरदार वल्लभभाई पटेल एक लोह पुरुष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सरदार वल्लभ भाई पटेल जी सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने अंग्रेजों को देश से  बाहर खदेड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को हुआ था। उनका जन्म बॉम्बे प्रेसिडेंसी के नडियाद गांव के एक पटेल परिवार में हुआ था जो अब गुजरात राज्य का एक हिस्सा है। उनके पिता जवेरभाई पटेल, झांसी की रानी के सेनाओं के एक सदस्य थे। उनकी मां लाडबाई का आध्यात्मिक के प्रति झुकाव था। उन्हें एक अच्छा सज्जन बनाने के लिए अच्छे एवं आदर्श गुण दिए गए। 22 वर्ष की उम्र में जब उन्हें आदर्श रूप से स्नातक होना चाहिए था तब उन्होंने अपनी मैट्रिकुलेशन पूरी की। यही कारण है कि तब कोई नहीं सोचा कि वह एक पेशेवर रूप से बहुत अच्छा काम करेगे। ऐसा माना जाता था कि वह एक साधारण नौकरी करके बस जाएगे। हालांकि, कानून की डिग्री प्राप्त करके उन्होंने सभी को गलत साबित कर दिया। बाद में उन्होंने लंदन में कानून की पढ़ाई की और बैरिस्टर की उपाधि हासिल की। सरदार वल्लभ भाई पटेल जी की मृत्यु 15 दिसम्बर , 1950 को भारत के मुम्बई राज्य में द...

भारत में मानवाधिकार का संरक्षण एवं विकास

भारत में मानवाधिकार का संरक्षण एवं विकास डा. विनी शर्मा सहायकाचार्या राजनीति विज्ञान केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर Sharmavini1975@gmail.com 9351507647 प्रत्येक मानव की एक गरिमा होती है, इस कारण वह अपने आप में बहुमूल्य है, और मनुष्य होने के नाते उसे गरिमामय जीवन जीने का पूरा अधिकार है, इसलिए पैदा होते ही प्रकृति उसे वे सब अधिकार प्रदान करती है जो एक मानव जाति के अस्तित्व के लिये ज़रूरी हैं। कोई भी व्यक्ति या राज्य किसी अन्य व्यक्ति से उन अधिकारों को छीन नहीं सकता है। ऐसे में मानव अधिकारों की रक्षा के लिये कानून द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया है। मानवाधिकार क्या हैं? मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो किसी भी व्यक्ति को जन्म के साथ ही मिल जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी भी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा का अधिकार ही मानव अधिकार है। इन अधिकारों की मांग प्रत्येक मनुष्य कर सकता है, चाहे इनके बारे में उस देश (जहाँ का वह निवासी है) के संविधान में प्रावधान किया गया हो या नहीं। इनकी उत्पत्ति का स्त्रोत मानवीय विवेक न होकर मानव का मानवोचित्त गुण ...

स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

WORLD OF POLITICS

स्वामी विवेकानन्द जी के शैक्षिक विचार: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन         स्वामी विवेकानंद जी का जन्म सन 1863 ईस्वी में कोलकाता में हुआ था। उनका पहले का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। वे बचपन से ही प्रतिभाशाली छात्र थे। उनके विषय में उनके प्रधानाचार्य हैस्ट्री ने कहा “मैंने विश्व के विभिन्न देशों की यात्राएं की हैं परंतु किशोरावस्था में ही इसके समान योग्य महान क्षमता वाला युवक मुझे जर्मन विश्वविद्यालय में नहीं मिला” स्वामी जी मिस्टर हैस्ट्री द्वारा दी गई प्रेरणा पर दक्षिणेश्वर पहुंचे। वहां उनकी रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात हुई। स्वामी जी ने उनसे साक्षात्कार किया, यह साक्षात्कार उनके जीवन की अपूर्व घटना थी। स्वामी जी को रामकृष्ण परमहंस के उत्तरों से संतोष मिला। नरेंद्र नाथ दूसरी बार अपने गुरु के दर्शन करने के लिए गए तो उन्हें दिव्य शक्ति का अनुभव हुआ। रामकृष्ण परमहंस जी के संपर्क में नरेंद्र जी 6 वर्ष तक रहे तथा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करके नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद बन गए। सन 1886 ईस्वी में स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का निधन हो गया। स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु की स्मृति...

स्वतंत्रता आंदोलन में रानी गिन्दीलू का योगदान लेख(नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई)

भारत ने विदेशी शासन से अपने को मुक्त कराने के लिए जो दीर्घकालीन संघर्ष किया, वह राष्ट्रीय वीरता की एक बेजोड़ गाथा है। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वालों के कष्टों और उत्पीड़न की अनकही दास्तान स्वशासन के लिए संकल्प और तड़क की पूर्ण गाथा का एक गौरवशाली हिस्सा रहे हैं। यह युद्ध सिर्फ राजनीतिक अधिकारों के लिए नहीं बल्कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विदेशी शासन के दामन से मुक्ति पाने का माध्यम था। स्वाधीनता आंदोलन के वर्षों में देश के कोने-कोने से संघर्ष की भावना लोगों के दिलों दिमाग में छा गई थी। जाति और संप्रदाय, क्षेत्र और धर्म से ऊपर उठकर देश के सभी भागों से इस आंदोलन को शक्ति प्राप्त हुई। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के सर्वोच्च बलिदान और निस्वार्थ भावना ने इतिहास के पन्नों पर अपनी पहचान दर्ज करवाई। हमारा स्वतंत्रता आंदोलन लिखित इतिहास का एक हिस्सा है परंतु असंख्य निस्वार्थ:, साहसी स्वतंत्रता सेनानी भी रहे हैं जिनका योगदान उजागर नहीं हो पाया है जिनकी अनदेखी कर दी गई है। इन सभी नायकों को याद किए बिना भारत की कहानी को पूर्ण रूप नहीं दिया जा सकता। भारत की स्वतंत्रता के 75 से भी अध...

भगवद्गीता में धर्म युद्ध का संदेश: आतंकवाद(भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में)

भगवद्गीता में धर्म युद्ध का संदेश: आतंकवाद (भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में) ------------------------------------------------------------------------- आज जब विश्व आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहा है जहां निर्दोषों की हत्या और आतंक फैलाना एक राजनीतिक हथियार बन गया है। ऐसे समय में भगवद्गीता का धर्म युद्ध का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। गीता केवल युद्ध का आह्वान नहीं करती बल्कि “न्याय, धर्म और मानवता की रक्षा” के लिए आवश्यक संघर्ष का मार्गदर्शन करती है। आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या के विरुद्ध संघर्ष को भगवद्गीता के आलोक में समझना आज संपूर्ण विश्व की महत्ती आवश्यकता है। गीता महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र पर अर्जुन के मोह और विषाद को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश है। गीता धर्म और अधर्म के बीच के अंतराल को स्पष्ट करते हुए धर्म के लिए संघर्ष को अनिवार्य बताती है। यह केवल बाहरी युद्ध का आख्यान नहीं बल्कि आध्यात्मिक नैतिक और मानसिक संघर्षों की व्याख्या भी करता है। “स्वधर्मं अपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न वि...

WORLD OF POLITICS

 भारतीय विधिशास्त्र की प्रासंगिकता भारतीय विधिशास्त्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक भारत तक, विधि का विकास और प्रयोग समाज के नैतिक, धार्मिक और सामाजिक मूल्यों से जुड़ा रहा है। इस शास्त्र ने न केवल भारतीय समाज को व्यवस्थित किया, बल्कि इसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों पर भी अपना प्रभाव डाला है। प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों, स्मृतियों, पुराणों और महाकाव्यों में विधि के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो आज के आधुनिक कानूनी प्रणाली में भी प्रासंगिक हैं। वैदिक काल में विधिशास्त्र:- वैदिक काल भारतीय विधिशास्त्र का प्रारंभिक चरण माना जाता है। इस काल में ‘ऋत’ की अवधारणा प्रमुख थी, जिसका अर्थ है प्राकृतिक व्यवस्था या नियम। ऋग्वेद में इस संदर्भ में उल्लेख मिलता है: ”ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥“ (ऋग्वेद 10.190.1) अर्थात् तप से ऋत और सत्य की उत्पत्ति हुई, जिससे रात्रि और फिर समुद्र उत्पन्न हुए। यहां ‘ऋत’ विश्व के नियमों का प्रतीक है, जो न्याय व्यवस्था का आधार है। अथर्ववेद में राज्य और शासन व्यवस्था के बारे में व...

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अहिल्या बाई होलकर  (नारी सशक्तिकरण की सशक्त मिसाल) शोध सारांश:-       नारी शक्ति क्या कर सकती है इसकी सबसे बड़ी मिसाल है रानी अहिल्याबाई होलकर। जीवन में परेशानी कितनी भी हो उनसे कैसे निपटा जाए यह हमें अहिल्याबाई के जीवन से सीखना चाहिए। अहिल्याबाई ने अपने संपूर्ण जीवन में बहुत सी परेशानियों का सामना किया लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। यही वजह है कि भारत सरकार ने भी उनको सम्मानित किया उनके नाम से डाक टिकट भी जारी हुआ और आज अहिल्याबाई के नाम से अवार्ड भी दिया जाता है। अहिल्याबाई ने इंदौर पर 30 सालों तक शासन किया। यह वक्त सुशासन और व्यवस्था की दृष्टि से यादगार माना जाता है। वह एक बेहद शानदार शासक और व्यवस्थापक थी। पूरी जिंदगी लोगों के बीच बेहद सम्माननीय रही और मृत्यु के बाद एक संत के तौर पर याद की जाती है। मराठा शासन के तहत मालवा की शासक रही अहिल्याबाई होल्कर के बारे में यह सभी बातें भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी। 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर में जन्मी अहिल्याबाई होल्कर को आज भी मध्यप्रदेश के मालवा और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में स...

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नारी: शक्ति, संकल्प और समानता की प्रतीक भारतीय संस्कृति में नारी को शक्ति का प्रतीक माना गया है। वेदों में कहा गया है – “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में नारी को उच्च स्थान प्राप्त था। वह शक्ति, ज्ञान और समृद्धि की प्रतीक मानी जाती थी। कालांतर में समाज में आई कुरीतियों के कारण नारी की स्थिति में गिरावट आई, लेकिन आज का युग नारी जागरण का युग है। आज की नारी अपनी शक्ति, संकल्प और समानता के लिए निरंतर संघर्षरत है। शक्ति का प्रतीक: नारी में अपार शक्ति निहित है। वह जीवन को धारण करने की शक्ति रखती है। माँ के रूप में वह सृजन की शक्ति है, तो दुर्गा के रूप में वह संहार की शक्ति है। नारी की शक्ति का प्रमाण इतिहास के पन्नों में दर्ज है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होल्कर जैसी वीरांगनाओं ने अपनी शक्ति का परिचय दिया। आधुनिक युग में इंदिरा गांधी, किरण बेदी, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स जैसी नारियों ने अपनी प्रतिभा से यह सिद्ध किया कि नारी किसी भी क्षेत्र में पुरुषो...