WORLD OF POLITICS

अहिल्या बाई होलकर 
(नारी सशक्तिकरण की सशक्त मिसाल)
शोध सारांश:-       नारी शक्ति क्या कर सकती है इसकी सबसे बड़ी मिसाल है रानी अहिल्याबाई होलकर। जीवन में परेशानी कितनी भी हो उनसे कैसे निपटा जाए यह हमें अहिल्याबाई के जीवन से सीखना चाहिए। अहिल्याबाई ने अपने संपूर्ण जीवन में बहुत सी परेशानियों का सामना किया लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। यही वजह है कि भारत सरकार ने भी उनको सम्मानित किया उनके नाम से डाक टिकट भी जारी हुआ और आज अहिल्याबाई के नाम से अवार्ड भी दिया जाता है। अहिल्याबाई ने इंदौर पर 30 सालों तक शासन किया। यह वक्त सुशासन और व्यवस्था की दृष्टि से यादगार माना जाता है। वह एक बेहद शानदार शासक और व्यवस्थापक थी। पूरी जिंदगी लोगों के बीच बेहद सम्माननीय रही और मृत्यु के बाद एक संत के तौर पर याद की जाती है। मराठा शासन के तहत मालवा की शासक रही अहिल्याबाई होल्कर के बारे में यह सभी बातें भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिखी थी। 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर में जन्मी अहिल्याबाई होल्कर को आज भी मध्यप्रदेश के मालवा और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में सम्मान से राजमाता कहकर बुलाया जाता है। अहिल्याबाई धनगर जाति से थी। उनके पिता मनको जी राव शिंदे ने उन्हें बचपन से पढ़ना लिखना सिखाया था। यह वह वक्त था जब लड़कियों की शिक्षा दीक्षा पर सामान्य परिवारों में बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता था।1 
परिचय:  अहिल्याबाई होल्कर का जन्म महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव चौंडी में हुआ। 31 मई 1725 ईस्वी में हुआ था। उनके पिता का नाम मनकोजी शिंदे माता का नाम सुशीला शिंदे था। मनकोजी बहुत ही विद्वान पुरुष थे यही कारण है कि उन्होंने अहिल्याबाई को हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा दी। उन्होंने अहिल्या को बचपन में ही शिक्षा देना शुरू कर दिया था जबकि उस समय महिलाओं को शिक्षा नहीं दी जाती थी। लेकिन मनको जी ने अपनी बेटी को शिक्षा भी दी और अच्छे संस्कार भी। घर में पली-बढ़ी अहिल्याबाई बचपन में ही दया भाव वाली थी। उनकी दयाभाव और आकर्षक छवि उनके जीवन को आकर्षक बनाती है। अहिल्याबाई बचपन से बहुत चंचल और समझदार थी ऐसे में उनकी शादी बचपन में ही खंडेराव होलकर के साथ करवा दी गई। कहते हैं कि एक बार राजा मल्हारराव होलकर पुणे जा रहे थे और उन्होंने चौंडी गांव में विश्राम किया। उस समय अहिल्याबाई गरीबों की मदद कर रही थी। उनका प्रेम और दया भाव देखकर मल्हारराव होलकर ने उनके पिता मनको जी से अपने बेटे खंडेराव होलकर के लिए अहिल्याबाई का हाथ मांग लिया था। उस समय अहिल्याबाई की उम्र महज 8 वर्ष थी। वह 8 वर्ष की आयु में मराठा की रानी बन गई। खंडेराव होलकर उग्र स्वभाव के थे, लेकिन अहिल्या बाई ने उन्हें एक अच्छे योद्धा बनने के लिए प्रेरित किया। खंडेराव होल्कर भी बहुत छोटे थे और उन्हें अपनी उम्र के अनुसार ज्ञान प्राप्त नहीं था तो उनके विकास में भी अहिल्याबाई का अहम योगदान रहा। अहिल्याबाई की शादी के 10 साल बाद में 1745 में उन्होंने मालेराव के रूप में पुत्र को जन्म दिया। पुत्र के जन्म के 3 साल बाद में 1748 में उन्होंने मुक्ताबाई नाम की पुत्री को जन्म दिया। अहिल्याबाई हमेशा अपने पति को राजकार्य में साथ दिया करती थी।2   अहिल्याबाई होलकर का जीवन काफी सुख में व्यतीत हो रहा था लेकिन 1754 में उनके पति खंडेराव होलकर का देहांत होने के कारण वह टूट गई थी उनके गुजर जाने के बाद अहिल्याबाई ने सती बनने का विचार किया जैसे ही उनके इस फैसले का पता मल्हारराव यानी उनके ससुर को पता चला तो उन्होंने अहिल्याबाई को अपना फैसला बदलने और अपने राज्य की दुहाई देकर उन्हें सती होने से रोका। ससुर की बात मानकर अहिल्याबाई ने फिर से अपने राज्य के प्रति सोचने सोचते हुए आगे बढ़ी लेकिन उनकी परेशानियां और उनके दुख कम होने वाले नहीं थे 1766 में उनके ससुर और 1767 में उनके बेटे मालेराव की मृत्यु हो गई अपने पति बेटे और ससुर को खोने के बाद अब अहिल्याबाई अकेली रह गई थी और राज्य का कार्यभार उनके ऊपर था राज्य को एक विकसित राज्य बनाने के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए। उनके जीवन में अनेक परेशानियां उस समय भी उनका इंतजार कर रही थी।               अहिल्याबाई जानती थी कि महिला होने के नाते सत्ता हासिल करने की राह में कई अड़चनें आएंगी। परन्तु फिर भी वे तैयार थी। पेशवाओं के सामने उन्होंने याचिका दायर की कि उन्हें शासन हाथ में लेने दिया जाए। शुरुआत में इसका विरोध होने के बावजूद भी वे रानी बन गई और 11 दिसंबर 1767 में उनका राज्याभिषेक भी हुआ। रानी बनने के बाद अहिल्याबाई ने पूरे मालवा प्रदेश के विकास पर ध्यान दिया। इंदौर के छोटे से गांव को उन्होंने एक फलते फूलते औद्योगिक व वाणिज्यिक केंद्र में परिणित कर दिया। साथ ही पूरे मालवा में उन्होंने सड़कें व किले बनवाए। अपनी राजधानी महेश्वर में भी उन्होंने नर्मदा नदी के किनारे एक बड़ा किला बनवाया जो, हम आज भी देख सकते हैं। अहिल्याबाई अपनी प्रजा की हिफाजत एक परिजन की तरह करती थी। हर रोज सभाओं में वे खुद अपनी प्रजा से बात करती थी। उनसे सलाह लेती, उनकी समस्या हल करती क्योंकि वह आम जनता को अपनों की तरह स्नेह करती थी। वह मानती थी कि जनता के धन और जायदाद पर रानी का कोई हक नहीं है। उनसे कर भी जितना कम हो सके उतना ही वसूल करती थी। अपने खर्चे भी सिर्फ अपने विरासत में पाए गए धन से उठाया करती थी और राजकीय कर विभिन्न विकास कार्यो के लिए इस्तेमाल करती थी। मालवा में ही नहीं बल्कि पूरे देश में उन्होंने कुएं, तालाब और घाट बनवाए।3                    वे मंदिरों में भी नियमित दान किया करती थी। बड़े उत्सवों के आयोजन में वे योगदान देती थी और देशभर में कई धार्मिक स्थलों का पुनर्विकास भी उन्होंने ही करवाया। वाराणसी में दशाश्वमेध घाट और मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास का श्रेय भी उन्हीं को जाता है और काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी उन्होंने करवाया। इसके अलावा उन्होंने तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए धार्मिक स्थलों में सेतुओं और धर्मशाला का निर्माण करवाया। गंगोत्री से लेकर रामेश्वरम तक द्वारका से लेकर गया तक ऐसे बहुत कम तीर्थस्थल हैं जिनके विकास में अहिल्याबाई की भूमिका नहीं रही हो। अहिल्याबाई का शासन न्याय और समानता का शासन था। उनके राज्य में कोई किसी से छोटा या बड़ा नहीं था और किसी को भेदभाव का शिकार नहीं होना पड़ता था। वह किसानों और व्यापारियों को खासतौर पर प्रोत्साहित करती थी और अपने दरबार में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान देती थी। अपनी बेटी की शादी भी एक आम गरीब नागरिक से करवा कर उन्होंने कई राजसी परंपरा तोड़ दी।                                   वे एक योद्धा भी थी जो जंग में खुद अपनी सेना का नेतृत्व करती थी। राजनीति की अच्छी समझ होने के नाते अंग्रेजों से दक्षतापूर्वक निपटाना भी उनके लिए मुश्किल नहीं था। कुल मिलाकर अहिल्याबाई होलकर एक करुणामई व दानशील नेता, एक दक्ष राजनीतिज्ञ, एक वीर योद्धा और एक कलाप्रेमी थी जिनके दरबार की रौनक संस्कृत और मराठी के बड़े-बड़े कवियों गायकों ने बढ़ाई थी। उनका शासनकाल हमारे इतिहास का एक गौरवमय युग था जो 13 अगस्त 1795 में उनकी मृत्यु के साथ खत्म हो गया। आज भी रानी अहिल्याबाई होलकर को इज्जत से याद किया जाता है। उनको लोकमाता अहिल्याबाई के नाम से भी संबोधित किया जाता है। साल 1996 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक मुद्रांक जारी किया था। अहिल्याबाई के जन्म दिवस के दिन 31 मई को  हर साल उनकी जयंती भी मनाई जाती है। इंदौर में देवी अहिल्या बाई होलकर हवाई अड्डा, देवी अहिल्या बाई विश्वविद्यालय उन्हीं के नाम से बनवाया गया। अहिल्या बाई की प्रतिष्ठा का प्रमुख कारण यह नहीं है कि उन्होंने देश भर में तीर्थों, चारों धामों, 12 ज्योतिर्लिंगों व अनेक मंदिरों में पुनरुत्थान के कार्य कराए, अन्न क्षेत्र आरंभ किए, धर्मशालायें बनवाई, नदियों पर बांध बंधवाए, वृक्षारोपण कराया सड़के और बावडिया बनवाई और मस्जिदों तथा पीर दरगाह को भी मदद की, बल्कि लोक उन्हें इसलिए पूजता है क्योंकि उन्होंने स्वयं को एक ऐसे उदाहरण के रूप में स्थापित किया जिसका सब कुछ था लेकिन स्वयं के लिए कुछ भी नहीं था। जो कुछ भी था वह लोक के लिए था उन्होंने अपनी निजता को समग्रता के लिए निछावर कर दिया था। उनके नेतृत्व की धारा समग्रता के सागर में विलीन हो गई थी और इसी कारण वे सरिता नहीं रही समुद्र हो गई। संसार में सरिताएं तो बहुत होती हैं लेकिन समुद्र गिने-चुने ही होते हैं। उनका अवदान यह तथ्य रेखांकित करता है कि एक सूत्रबध्दता क्या होती है और साधन भले ही सीमित हो लेकिन यदि साध्य पवित्र हो तो स्वाभिमान के साथ अपनी स्वतंत्रता को कैसे बरकरार रखते हुए विकास के पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है। यदि उनके कृतित्व को देखें तो पाएंगे कि उसके दो पक्ष हैं पहला पक्ष तो उनकी धार्मिक और न्यायिक व्यक्ति का है और दूसरा पक्ष उनके सुशासन और दूरदर्शिता का है।4             उनके दरबार के सभा पंडित खुशालीराम ने देवी अहिल्या के गुणों का वर्णन करते हुए “अहिल्या कामधेनु” नामक ग्रंथ लिखा जो देवी अहिल्या कामधेनु के नाम से प्रसिद्ध है। इन श्लोकों में उनके सर्व धर्म सर्वज्ञ होने तथा उनकी ससर्वोदय भावना के ग्राम-दान व भू-दान के रुप में प्रगट होने का उल्लेख है। उनकी सैन्य प्रतिभा के अनेक प्रमाण अभिलेखों में उपलब्ध हैं। उनकी सफल कूटनीति का साक्ष्य यह है कि विशाल सैन्य बल से सज्ज आक्रमण की नियत से आए राघोबा को उन्होंने अकेले पालकी में बैठाकर उनसे मिलने आने के लिए उसे विवश कर दिया। डाकुओं और भीलों को उन्होंने समाज की मुख्यधारा में लाने का यत्न किया तथा समाज के उपेक्षित लोगों की सेवा को उन्होंने ईश्वर की सेवा माना। उनकी व्यवसायिक दूरदृष्टि का उदाहरण महेश्वर का वह वस्त्र उद्योग है जहां आज भी सैकड़ों बुनकरों को आजीविका मिलती है तथा यहां की साड़ियां विश्व प्रसिद्ध है। वह अद्भुत दृष्टि संपन्न विदुषी थी। शास्त्र और व्याकरण से लेकर वैद्यक और पूजा कर्म तक भी में पारंगत 20 पंडितों को उन्होंने आमंत्रित किया तथा हस्तलिखित ग्रंथ तैयार करवाए।5 उन्होंने पर्दा नहीं किया तथा स्त्रियों के अधिकार के लिए कानून में बदलाव किए जिसके कारण विधवाओं को पति की संपत्ति पर तथा पुत्र को गोद लेने का अधिकार मिला। अहिल्यादेवी ने डाक व्यवस्था आरंभ की तथा 1783 में पदम सिंह ने नेनसी नामक कंपनी को महेश्वर से पुणे तक ले जाने का कार्य सौंपा। उन्होंने अंग्रेजों की कुटिल चालों की तुलना रीछ की चालों से की जो अपने शत्रु पर सीधा वार नहीं करता अपितु उसे आलिंगन में लेकर मार डालता है। इसलिए वें कहती थी कि उसके सिर पर प्रहार करना चाहिए। अंग्रेजों के विरुद्ध उन्होंने सभी की एकता का आह्वान किया तथा उनके प्रवेश को रोकने के लिए घाटों को बंद करने का भी आह्वान किया।  माता अहिल्या की भूरी प्रशंसा देश और विदेश के विद्वानों इतिहासकारों राजनीतिज्ञों ने की है। डॉ उदय भानु शर्मा उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहते हैं “मेरी ही गोद में विश्व का वह अनोखा रत्न खो गया। इस सोच में महेश्वर का किला आज भी नतमस्तक हो आंसू बहा रहा है। नर्मदा भी इसी कारण प्रायश्चितस्वरूप, निस्तब्ध रात्रि में उस घाट पर, जहां देवी का भौतिक शरीर पंचतत्व को प्राप्त हुआ था, दुखी होकर विलाप करती हुई दिखाई पड़ती है। उनकी श्रेष्ठता इंदौर की शासिका होने में नहीं क्योंकि उनका त्याग इतना अनुपम, उनका साहस इतना असीम, उनकी प्रतिभा इतनी उत्कृष्ट, उनका संयम इतना कठिन और उनकी उदारता इतनी विशाल थी कि उनका नाम इतिहास में  स्वर्णाक्षरों में लिखा जा चुका है उनके पवित्र चरित्र और विराट प्रेम ने उन्हें लोकजीवन में लोकमाता का वह उच्चासन दिया, जो संसार में बड़े सम्राटों-साम्राज्ञीयों को सुलभ नहीं रहा।“ भूतपूर्व उपराष्ट्रपति डॉ. गोपालस्वरूप पाठक कहते हैं “अहिल्याबाई भारतीय संस्कृति की मूर्तिमान प्रतीक थी। कितने आपत्ति के प्रसंग तथा कसौटीयों के प्रसंग उस तेजस्विनी पर आए लेकिन उन सबका बड़े धैर्य से मुकाबला कर धर्म संभालते हुए उन्होंने राज्य का संसार सुरक्षित रखा, यह उनकी विशेषता थी। उन्होंने भारतीय संस्कृति की परंपराएं सबके सामने रखी भारतीय संस्कृति जब तक जागृत है तब तक अहिल्याबाई के चरित्र से ही हमें प्रेरणा मिलती रहेगी।“ श्रीमती एनी बिसेंट ने लिखा कि उनकी दृष्टि में हिंदू और मुस्लिम समान थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू कहते हैं कि “जिस समय वह गद्दी पर बैठी 30 वर्ष की नौजवान विधवा थी और अपने राज्य के प्रशासन में वह बड़ी खूबी से सफल रही। वह स्वयं राज्य का कारोबार देखती थी। उन्होंने युद्धों को टाला, शांति कायम रखी और अपने राज्य को ऐसे समय में खुशहाल बनाया जबकि भारत का हर हिस्सा उथल-पुथल की हालत में था। इसलिए यह ताज्जुब की बात नहीं कि आज भी भारत में संत की तरह पूजी जाती हैं।“ अत: पंडित नेहरू ने उनकी संत शासिका के रूप में प्रशस्ति की। प्रख्यात इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने उन्हें प्रथम श्रेणी की राजनीतिज्ञ माना। जॉन मालकस ने उन्हें देवी कहा। जॉन कीस ने उन्हें दार्शनिक महारानी की उपाधि दी और जॉन बेली ने 1849 में उन पर एक सुंदर कविता लिखी। राव बहादुर की बहने उचित ही कहा है “show what a leading part the pious lady Ahilyabai took in the stirring events of the time.” उनकी एक समकालीन अंगल कवित्री जोना बेली ने कहा “For thirty years her reign of peace, The land in blessing did increase, And she was blessed by every tongue, By stern and gentle; old and young”. हाल ही में इंदौर की यशस्वी सांसद तथा पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन ने मातोश्री नामक नाटक लिखा जो देवी अहिल्या के गुणों का प्रतिबिंब है तथा इसमें अनेक उनके जीवन की 15 प्रमुख घटनाओं को वर्णित किया गया है।6        लोकमाता अहिल्या के व्यक्तित्व और कृतित्व के संबंध में बहुत लिखा गया है वह क्षितिज की तरह है जिसे मापने के पैमाने अभी तक नहीं बने हैं। हम उन स्वप्न दृष्टाओं का सम्मान करते हैं जिन्होंने बंद आंखों से जो सपने देखे उन्हें साकार कर खुली आंखों से देखा। लेकिन माता अहिल्या स्वप्न दृष्टा नहीं थी वे संकल्प सृष्टा थी। उन्होंने जो संकल्प लिया उसे अपने कर्म से पूर्ण कर दिया। सपने देखने के लिए आंखों को बंद करने का धैर्य उन्होंने नहीं रखा। हम जय, पराजय और उनके इतिहास में दर्ज करने को लेकर चिंतित रहते हैं कि इतिहास कहीं हमारी पराजय को अपने पन्नों में न लिख ले लेकिन मां अहिल्या जैसी बिरले व्यक्तित्व इतिहास में गिने-चुने होते हैं जिन्होंने अपने कर्म से केवल जय ही अर्जित की और इतिहास की इसलिए चिंता  जनता नहीं की क्योंकि उन्होंने स्वयं को अपने इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित कर लिया।7 उन्हें दैवीय कहा गया किंतु सच यह है कि उनकी कृतित्व से देवत्व के शीर्ष पर मनुष्यता विराज गई। माता अहिल्या देवत्व के हिमालय की गौरी शंकर है। इन दिनों जब हम अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहे हैं तब इस अमृता का स्मरण होना चाहिए। उनकी स्मृति कहीं हमें स्वप्न दृष्टा नहीं संकल्प सृष्टा बनाएगी। ऐसी संकल्प सृष्टा को अर्पित करने के लिए असंख्य अंजुरियों से भरे अगणित प्रणाम भी बहुत थोड़े हैं। जहां आज राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व इतना कम है यह याद करना हमारे लिए जरूरी हो जाता है कि एक समय में अहिल्याबाई जैसे कर्मठ महिला राजनीतिज्ञ ने अपने कुशल प्रशासन में से सामाजिक और आर्थिक प्रगति लाने में मदद की है। 
डा. विनी शर्मा
सहायकाचार्या राजनीति विज्ञान
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर
Sharmavini1975@gmail.com 9351507647

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मतदान की निष्पक्षता : लोकतंत्र की बुनियाद

महिला जातक, पालक और तारक

WORLD OF POLITICS