भारत में मानवाधिकार का संरक्षण एवं विकास
भारत में मानवाधिकार का संरक्षण एवं विकास
डा. विनी शर्मा
सहायकाचार्या राजनीति विज्ञान
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर परिसर
Sharmavini1975@gmail.com
9351507647
प्रत्येक मानव की एक गरिमा होती है, इस कारण वह अपने आप में बहुमूल्य है, और मनुष्य होने के नाते उसे गरिमामय जीवन जीने का पूरा अधिकार है, इसलिए पैदा होते ही प्रकृति उसे वे सब अधिकार प्रदान करती है जो एक मानव जाति के अस्तित्व के लिये ज़रूरी हैं। कोई भी व्यक्ति या राज्य किसी अन्य व्यक्ति से उन अधिकारों को छीन नहीं सकता है। ऐसे में मानव अधिकारों की रक्षा के लिये कानून द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया है।
मानवाधिकार क्या हैं?
मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो किसी भी व्यक्ति को जन्म के साथ ही मिल जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो किसी भी व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा का अधिकार ही मानव अधिकार है। इन अधिकारों की मांग प्रत्येक मनुष्य कर सकता है, चाहे इनके बारे में उस देश (जहाँ का वह निवासी है) के संविधान में प्रावधान किया गया हो या नहीं। इनकी उत्पत्ति का स्त्रोत मानवीय विवेक न होकर मानव का मानवोचित्त गुण है। इनके अंतर्गत राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जैसे अन्य अधिकार भी शामिल हैं। इन्हीं अधिकारों के संबंध में संयुक्त राष्ट्र ने साल 1948 में एक घोषणा-पत्र जारी किया था। इस घोषणा-पत्र में कहा गया था कि मानव के बुनियादी अधिकार किसी भी नस्ल, जाति, धर्म, लिंग, समुदाय और भाषा आदि से भिन्न होते हैं।
मानव अधिकारों की उत्पत्ति:
‘मानवाधिकार’ शब्द का प्रयोग 20वीं शताब्दी में किया गया था। इसके पहले अधिकारों के संदर्भ में ‘प्राकृतिक अधिकार’ अथवा ‘व्यक्ति के अधिकार’ शब्द प्रचलन में थे। प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धांत की उत्पत्ति 17वीं शताब्दी में प्रसिद्ध दार्शनिकों ग्रोशियस, हॉब्स और लॉक की रचनाओं में हुई थी। उन्होंने बताया था कि प्राकृतिक अधिकारों का मुख्य आधार ‘प्राकृतिक कानून’ हैं। यह कानून प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता तथा संपत्ति का सम्मान करने की बात कहते हैं। जॉन लॉक ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दी टू ट्रीटसेज़ ऑन गवर्नमेंट” में इन प्राकृतिक सिद्धांतों का उल्लेख किया है।
इसके अलावा, 1776 में अमेरिका द्वारा स्वतंत्रता के संबंध में जारी किये गए घोषणापत्र में भी कहा गया था कि ‘सभी व्यक्ति समान पैदा हुए हैं तथा सृष्टिकर्ता ने उन्हें जीवन, स्वतंत्रता तथा सुख की प्राप्ति जैसे कुछ अदेय अधिकार प्रदान किये हैं।’ तत्पश्चात 1789 में फ्रांस द्वारा घोषित मानव और नागरिक अधिकारों के घोषणापत्र में एक बार फिर व्यक्ति के अधिकारों की प्राकृतिक व अदेयता की बात कही गई थी। इन देशों ने अपने नागरिकों को ये अधिकार एक व्यक्ति होने के नाते दिया था न कि एक राज्य होने के नाते।
17वीं और 18वीं शताब्दी में प्राकृतिक अधिकारों से संबंधित जो घोषणाएँ की गई थीं; 20वीं शताब्दी में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र और इनसे संबंधित कई अन्य समझौतों के माध्यम से उन्हीं का और विस्तार किया गया। आसान भाषा में कहें तो मानवाधिकार पुराने प्राकृतिक अधिकारों के ही उत्तराधिकारी हैं।
मानव अधिकारों के प्रकार:
वैसे तो मानव अधिकारों की कोई एक निश्चित संख्या नहीं है। विविध प्रकार के समाजों में जैसे-जैसे नए खतरे और चुनौतियाँ सामने आ रहीं हैं, वैसे-वैसे मानवाधिकारों की सूची लगातार बढ़ती जा रही है। यहाँ पर हम संयुक्त राष्ट्र के सार्वभौमिक घोषणापत्र में उल्लिखित मानवाधिकारों के बारे में जानेंगे। इस घोषणापत्र में कुल 30 अनुच्छेद हैं, जिनमें उल्लिखित मानवाधिकारों को सामान्य तौर पर नागरिक-राजनीतिक और आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक श्रेणियों में बाँटा गया है। इसके अनुच्छेद-3 में व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा के अधिकारों की बात कही गई है जो अन्य सभी अधिकारों के उपभोग के लिये ज़रूरी हैं।
नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार- सार्वभौमिक घोषणापत्र में अनुच्छेद 4 से लेकर अनुच्छेद 21 तक नागरिक व राजनीतिक अधिकारों के बारे में विस्तार से बताया गया है। इनके अन्तर्गत आने वाले प्रमुख अधिकार इस प्रकार हैं-
दासता से मुक्ति का अधिकार
निर्दयी, अमानवीय व्यवहार अथवा सजा से मुक्ति का अधिकार
कानून के समक्ष समानता का अधिकार
प्रभावशाली न्यायिक उपचार का अधिकार
आवागमन तथा निवास स्थान चुनने की स्वतंत्रता
शादी करके घर बसाने का अधिकार
विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
उचित निष्पक्ष मुकदमें का अधिकार
मनमर्जी की गिरफ्तारी अथवा बंदीकरण से मुक्ति का अधिकार
न्यायालय द्वारा सार्वजनिक सुनवाई का अधिकार
अपराधी साबित होने से पहले बेगुनाह माने जाने का अधिकार
व्यक्ति की गोपनीयता, घर,परिवार तथा पत्र व्यवहार में अवांछनीय हस्तक्षेप पर प्रतिबंध
शांतिपूर्ण ढंग से किसी स्थान पर इकट्ठा होने का अधिकार
शरणागति प्राप्त करने का अधिकार
राष्ट्रीयता का अधिकार
अपने देश की सरकारी गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार
अपने देश की सार्वजनिक सेवाओं तक सामान पहुँच का अधिकार
आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकार- नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के अतिरिक्त, घोषणापत्र के अगले छह अनुच्छेदों में आर्थिक,सामाजिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों के बारे में बताया गया है। इनके अंतर्गत आने वाले प्रमुख अधिकार निम्नलिखित हैं-
सामाजिक सुरक्षा का अधिकार
समान काम के लिये समान वेतन का अधिकार
काम करने का अधिकार
आराम तथा फुर्सत का अधिकार
शिक्षा तथा समाज के सांस्कृतिक जीवन में भाग लेने का अधिकार
मानवाधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा:
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मानवाधिकारों का जमकर उल्लंघन किया गया था। इस कारण से भविष्य में मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु ठोस व्यवस्था किये जाने की ज़रूरत महसूस हुई और 10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार कर लिया। सामान्य सभा ने सभी सदस्य देशों से इस घोषणा-पत्र को प्रसारित करने का आह्वान किया था। मानवाधिकारों की रक्षा से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में 48 देशों ने हस्ताक्षर किये थे जिनमें भारत भी शामिल था। लेकिन भारत में मानवाधिकारों से जुड़ी एक स्वतंत्र संस्था बनाने में 45 वर्ष लग गए। 12 अक्टूबर 1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का गठन किया गया। इसके अलावा, राज्यों में भी मानवाधिकार आयोगों के गठन का प्रावधान किया गया। चलिये जानते हैं NHRC के बारे में-
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission)
मानव अधिकारों के संरक्षण के मामले में यह देश की सर्वोच्च संस्था है।
यह एक सांविधिक निकाय है, जिसका गठन 1991 के पेरिस सिद्धांतों के मुताबिक हुआ है।
मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायत मिलने पर NHRC स्वयं अपनी पहल पर या पीड़ित व्यक्ति की याचिका पर जाँच कर सकता है।
इस आयोग के कार्य-क्षेत्र में जेलों में बंदियों की स्थिति का अध्ययन करना, न्यायिक व पुलिस हिरासत में हुई मृत्यु की जाँच-पड़ताल करना, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और लोगों के गायब होने आदि मामलों की जाँच करना शामिल है।
मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध कार्य करना या शोध को बढ़ावा देना और लोगों को मानवाधिकारों के प्रति जागरूक करना भी इस आयोग के कार्यों में शामिल है।
यह आयोग मानवाधिकार से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय संधियों, सम्मेलनों और रिपोर्ट्स का अध्ययन कर उनके प्रभावी अनुपालन की सिफारिश भी करता है।
इनके अलावा भी NHRC के कई कार्य हैं।
NHRC की सीमाएं:
आमतौर पर NHRC की तुलना बिना नाखूनों और बिना दाँतों वाले शेर से की जाती है, जो कहने को तो शेर होता है लेकिन उसकी शक्तियाँ न के बराबर होती हैं। इस तुलना का कारण यह है कि मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले में यह आयोग न तो किसी को दंडित कर सकता है और न ही किसी को मुआवजा दे सकता है। यह केवल अपनी जाँच के आधार पर सरकार या न्यायालय से मुकदमे की सुनवाई की सिफारिश कर सकता है। इतना ही नहीं, केंद्र और राज्य सरकारें आयोग की सिफारिशें मानने के लिये बाध्य नहीं हैं।
आयोग उन शिकायतों की जाँच नहीं कर सकता जो घटना होने के एक साल बाद दर्ज कराई गईं हों। साथ ही, आयोग के पास सैन्य बलों द्वारा मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों की जाँच का अधिकार भी नहीं है।
बड़ी संख्या में पदों का खाली पड़े रहना, संसाधनों व धन की कमी, आयोगों के अंदर सदस्यों का नौकरशाही ढर्रे पर काम करना, पुलिस व अन्य जाँच एजेंसियों का पूरी तरह से सहयोग न करना आदि आयोग की राह में रुकावट का बड़ा कारण हैं।
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