भगवद्गीता में धर्म युद्ध का संदेश: आतंकवाद(भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में)
भगवद्गीता में धर्म युद्ध का संदेश: आतंकवाद
(भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में)
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आज जब विश्व आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहा है जहां निर्दोषों की हत्या और आतंक फैलाना एक राजनीतिक हथियार बन गया है। ऐसे समय में भगवद्गीता का धर्म युद्ध का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। गीता केवल युद्ध का आह्वान नहीं करती बल्कि “न्याय, धर्म और मानवता की रक्षा” के लिए आवश्यक संघर्ष का मार्गदर्शन करती है। आतंकवाद जैसी वैश्विक समस्या के विरुद्ध संघर्ष को भगवद्गीता के आलोक में समझना आज संपूर्ण विश्व की महत्ती आवश्यकता है।
गीता महाभारत की युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र पर अर्जुन के मोह और विषाद को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश है। गीता धर्म और अधर्म के बीच के अंतराल को स्पष्ट करते हुए धर्म के लिए संघर्ष को अनिवार्य बताती है। यह केवल बाहरी युद्ध का आख्यान नहीं बल्कि आध्यात्मिक नैतिक और मानसिक संघर्षों की व्याख्या भी करता है।
“स्वधर्मं अपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥“
अर्थात, अपने क्षत्रिय धर्म को देखते हुए अर्जुन तुम्हें युद्ध से विचलित नहीं होना चाहिए। क्षत्रिय के लिए धर्म युक्त युद्ध से बढ़कर कुछ भी कल्याणकारी नहीं है। अतः आज भी यह संदेश हमें सिखाता है कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष को टालना अधर्म को बढ़ावा देना है। न्याय की रक्षा हेतु सक्रिय होकर खड़ा होना धर्म का पालन ही है।
आतंकवाद अराजकता, अन्याय और हिंसा का चरम स्वरूप है। यह निर्दोषों पर हमला कर समाज में भय आतंक और विघटन को फैलाता है। यह मानवता के मूल मूल्य जैसे: करुणा, सत्य और अहिंसा के विरुद्ध है। आतंकवाद असत्य, अत्याचार और स्वार्थ का परिणाम है और गीता के अनुसार ऐसे अधर्म के विरुद्ध संघर्ष करना स्वयं धर्म को बढ़ावा देना है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
अर्थात, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का प्रकोप बढ़ता है तब-तब मैं (भगवान) सृष्टि में अवतरित होता हूं, सज्जनों की रक्षा दुश्मनों के विनाश और धर्म की स्थापना हेतु। अत: आज भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है आतंकवाद के दुष्कर्मियों का विनाश और मानवता की रक्षा के लिए धर्मसंस्थापन कार्य करना। गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा गया है कि युद्ध के भय और मोह में पढ़कर अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए। ठीक उसी तरह आतंकवाद से लड़ने में भी समाज, राज्य, राष्ट्र, विश्व को निर्भय होकर कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप॥
अर्थात, हे पार्थ! दुर्बलता को प्राप्त मत करो, यह तुम्हारे लिए शोभनीय नहीं है। हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर उठो और युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। इसी संदर्भ में कहा जा सकता है कि आतंक का भय छोड़कर साहसपूर्वक सत्य और धर्म की रक्षा के लिए आगे बढ़ना ही आज का आह्वान है।
गीता में बताया गया है कि धर्म युद्ध भी सीमाओं में बंधा होना चाहिए। क्रोध, घृणा और स्वार्थ से नहीं बल्कि न्याय और धर्म के लिए लड़ना चाहिए।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥
अर्थात, इसलिए तू आसक्ति त्याग कर निरंतर अपने कर्तव्य का पालन कर। कर्म करते हुए आसक्ति रहित पुरुष परम सिद्धि को प्राप्त करता है। अतः वर्तमान संदर्भ में भी आतंकवाद के विरुद्ध लड़ते समय भी नैतिकता और विवेक का पालन करना चाहिए अन्यथा हम भी उसी अधर्म के चक्र में फंस जाएंगे जिससे हम लड़ रहे हैं।
आज जब आतंकवाद निर्दोष जीवनों को लील रहा है, भारत और संपूर्ण मानवता के लिए गीता का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है। अतः गीता का दर्शन हमें यह शिक्षा देता है कि आतंकवाद से लड़ना केवल सुरक्षा या राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि “धर्म और मानवता” की रक्षा करना है। संघर्ष के समय संयम, नैतिकता, न्याय का पालन महत्वपूर्ण है। अत: भय से मुक्त होकर सत्य के पक्ष में डटे रहना चाहिए। भारत में सदैव आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष को न्यायपूर्ण, नैतिक और संयमित रूप से प्रस्तुत किया है। हम देख सकते हैं कि 1984 ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1999 कारगिल युद्ध, 2008 मुंबई 26/11 आतंकी हमला, 2016 उरी हमला और सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 पुलवामा हमला और बालाकोट एयर स्ट्राइक।
भारत का प्रत्येक आतंकवाद विरोधी कदम केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं रहा, बल्कि उसमें गीता के धर्म, न्याय और कर्तव्य बोध का गहन प्रभाव था। भारत कभी आक्रमण की पहल नहीं करता, लेकिन अधर्म और आतंक के विरुद्ध श्री कृष्ण के उपदेशों की भावना से प्रेरित होकर दृढ़ प्रतिकार करता है। 22 अप्रैल 2025 के दिन फिर से आतंकवादियों ने भारत की आत्मा को झकझोर दिया। जम्मू-कश्मीर के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल पहलगाम में आतंकी हमले में निर्दोष पर्यटकों को निशाना बनाया गया। यह एक शारीरिक आक्रमण नहीं बल्कि अधर्म की पराकाष्ठा है और भारत की सहिष्णुता, संस्कृति, शांति और मानवीय मूल्यों पर किया गया गहरा आघात है। इस भयावह कृत्य ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि हम हिंसा और अधर्म के युग में धर्म, न्याय मानवता की रक्षा कैसे करें? इस प्रश्न का उत्तर भी हमें भगवद्गीता से ही प्राप्त होता है कि कब, क्यों और कैसे अधर्म के विरुद्ध “धर्मयुक्त संघर्ष” किया जाए। गीता में कहा गया है कि-
“न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्”
(कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी निष्क्रिय नहीं रह सकता) अत: हमारा कर्तव्य है सक्रिय रहना और जब अधर्म सामने हो तो धर्म के पक्ष में लड़ना ही भगवद्गीता में श्री कृष्ण का उपदेश है।
डॉ. विनी शर्मा,सहायकाचार्या, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर, सदस्या हिन्दी प्रचार -प्रसार संस्थान।
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