भारतीय विधिशास्त्र की प्रासंगिकता भारतीय विधिशास्त्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक भारत तक, विधि का विकास और प्रयोग समाज के नैतिक, धार्मिक और सामाजिक मूल्यों से जुड़ा रहा है। इस शास्त्र ने न केवल भारतीय समाज को व्यवस्थित किया, बल्कि इसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों पर भी अपना प्रभाव डाला है। प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्रों, स्मृतियों, पुराणों और महाकाव्यों में विधि के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो आज के आधुनिक कानूनी प्रणाली में भी प्रासंगिक हैं। वैदिक काल में विधिशास्त्र:- वैदिक काल भारतीय विधिशास्त्र का प्रारंभिक चरण माना जाता है। इस काल में ‘ऋत’ की अवधारणा प्रमुख थी, जिसका अर्थ है प्राकृतिक व्यवस्था या नियम। ऋग्वेद में इस संदर्भ में उल्लेख मिलता है: ”ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥“ (ऋग्वेद 10.190.1) अर्थात् तप से ऋत और सत्य की उत्पत्ति हुई, जिससे रात्रि और फिर समुद्र उत्पन्न हुए। यहां ‘ऋत’ विश्व के नियमों का प्रतीक है, जो न्याय व्यवस्था का आधार है। अथर्ववेद में राज्य और शासन व्यवस्था के बारे में व...
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