स्वतंत्रता आंदोलन में रानी गिन्दीलू का योगदान लेख(नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई)

भारत ने विदेशी शासन से अपने को मुक्त कराने के लिए जो दीर्घकालीन संघर्ष किया, वह राष्ट्रीय वीरता की एक बेजोड़ गाथा है। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वालों के कष्टों और उत्पीड़न की अनकही दास्तान स्वशासन के लिए संकल्प और तड़क की पूर्ण गाथा का एक गौरवशाली हिस्सा रहे हैं। यह युद्ध सिर्फ राजनीतिक अधिकारों के लिए नहीं बल्कि जीवन के सभी क्षेत्रों में विदेशी शासन के दामन से मुक्ति पाने का माध्यम था। स्वाधीनता आंदोलन के वर्षों में देश के कोने-कोने से संघर्ष की भावना लोगों के दिलों दिमाग में छा गई थी। जाति और संप्रदाय, क्षेत्र और धर्म से ऊपर उठकर देश के सभी भागों से इस आंदोलन को शक्ति प्राप्त हुई। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के सर्वोच्च बलिदान और निस्वार्थ भावना ने इतिहास के पन्नों पर अपनी पहचान दर्ज करवाई। हमारा स्वतंत्रता आंदोलन लिखित इतिहास का एक हिस्सा है परंतु असंख्य निस्वार्थ:, साहसी स्वतंत्रता सेनानी भी रहे हैं जिनका योगदान उजागर नहीं हो पाया है जिनकी अनदेखी कर दी गई है। इन सभी नायकों को याद किए बिना भारत की कहानी को पूर्ण रूप नहीं दिया जा सकता। भारत की स्वतंत्रता के 75 से भी अधिक वर्ष पूरे करने के अवसर पर हम देश के महान सपूतों को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

    अतः भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास असंख्य बहादुर व्यक्तियों के योगदान से परिपूर्ण है; उनमें से एक आध्यात्मिक और राजनीतिक नागा नेत्री रानी गिन्दीलू थी यद्यपि वह रानी गिन्दीलू के नाम से प्रसिद्ध है लेकिन उनकी बचपन का नाम गिन्दीलू ही था। वह रेंगमा जनजाति से संबंधित थी जो तीन जेलियांग्रांग जनजातियों में से एक है।  रानी गिन्दीलू का जन्म मणिपुर के लुआंगकाओ गांव में 26 जनवरी 1915 को, मृत्यु भारत में 17 फरवरी 1993 को हुई। उनके जन्म से कुछ दिन पूर्व उनके पिता को स्वप्न में एक देवदूत ने बताया था कि तुम्हारे यहां बेटी का जन्म होगा जो तुम्हारी जाति के कष्टों को दूर करेगी। बेटी के जन्म के बाद गांव के बुजुर्गों ने गिन्दीलू नाम रखा। जिसका अर्थ होता है अच्छा मार्ग दिखाने वाली। गिन्दीलू ने बचपन से ही आध्यात्मिकता के प्रति रुझान दिखाया था। रात्रि में चंद्रमा को देखकर ध्यानावस्थित हो जाती थी। लोगों का विश्वास था कि उनमें दैवीय शक्ति का निवास है और उन्हें चेराचानदिल्यू (देवी दुर्गा) का अवतार मानने लगे थे। उनकी मान्यता थी कि गिन्दीलू के स्पर्श किए गए जल के पान से बीमारियां ठीक हो जाती हैं और दूर-दूर से लोग गिन्दीलू के स्पर्श किया जल लेने के लिए उनके पास जाते थे। मान्यता है कि गिन्दीलू को देवी ने साक्षात दर्शन दिए। देवी के आदेश अनुसार उन्होंने भुवन पहाड़ की चार धार्मिक यात्राएं की। इन यात्राओं में गिन्दीलू के अनुयाई उनके साथ रहते थे। देवी ने उनसे कहा कि भुवन पहाड़ी पर स्थित विष्णु गुफा उसके कार्यक्षेत्र का केंद्र होगा। वहीं पर विष्णु (विष्णु भगवान) का मंदिर स्थित है। वहां की स्थानीय भाषा में भगवान को तिंगवान कहते हैं।

     रानी गिन्दीलू भारत की प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारियों में से एक थी। उन्होंने देश की आजादी के लिए नागालैंड में अपने क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम दिया। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के समान वीरतापूर्ण कार्य करने के लिए इन्हें नागालैंड की रानी लक्ष्मीबाई कहा जाता है। जब रानी गिन्दीलू को अपने क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया तब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कई वर्षों की सजा काट चुकी रानी को न्याय दिलाने के प्रयास किया, किंतु अंग्रेजों ने उनकी इस बात को नहीं माना क्योंकि भी रानी से बहुत भयभीत थे और उन्हें अपने लिए खतरनाक मानते थे। बचपन से ही बड़ी स्वतंत्र और स्वाभिमानी स्वभाव की थी। उन्होंने आजन्म अविवाहित रहकर समाज में धर्म जागरण करने तथा नागा क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने के लिए आंदोलन करने का व्रत ले लिया था। क्रांतिकारी दुनिया से गिन्दीलू का परिचय 13 वर्ष की उम्र में हुआ जब वे “हेरका आंदोलन” में शामिल हुई थी। यह एक सामाजिक धार्मिक आंदोलन था जिसकी शुरुआत गिन्दीलू के चचेरे भाई “हैपोउ जादोनांग” के नेतृत्व में हुई थी। जादोनांग अपने कबीले के आध्यात्मिक नेता थे जिन्होंने उन ब्रिटिश मिशनरियों के खिलाफ प्रचार किया। जिनका उद्देश्य नागा जनजातियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना था। रानी गिन्दीलू तथा जादूनांग ने नागा जाति के तीन कबीलों जेमी, ल्यांगमेयी तथा रंगमेयी में एकात्मकता स्थापित करने के लिए हेरका आंदोलन चलाया। तीनों के सम्मिलित स्वरूप को जेलियांग्रांग कहा गया। हेरका आंदोलन ने नागाओं के स्वशासन की मांग का समर्थन किया। हालांकि इस आंदोलन के उद्देश्य धार्मिक सुधार से संबंधित थे, फिर भी इसमें ब्रिटिश शासन के प्रति राजनीतिक विरोध की आंतरिक भावना मौजूद थी। इसलिए अंग्रेज इस आंदोलन और उसके नेताओं से भयभीत रहते थे। 1931 में इस आंदोलन को एक बड़ा झटका लगा। वर्तमान कछार जिले के लखीमपुर थाने के दरोगा अली ने अपने नौकर के माध्यम से जादोनांग को यह कहकर बुलवाया कि उसकी पत्नी बीमार है। यदि जादोनांग स्पर्ष कर देंगे तो वह ठीक हो जावेगी। जादोनांग के वहां पहुंचने पर धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अत: जादोनांग अपने आंदोलन को क्रियात्मक रूप दे पाते उससे पहले उन्हें एक झूठे मुकदमे में फसा करके अंग्रेजों ने उन्हें 29 अगस्त 1931 को फांसी पर लटका दिया। जादोनांग के असामयिक निधन के बाद गिन्दीलू उनकी राजनीतिक और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी के रूप में उभरी और आंदोलन की कमान उन्हें सौंप दी गई।

    17 साल की उम्र में गिन्दीलू ने गांधीवादी सिद्धांतों का प्रचार करना और ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक खुला विद्रोह करना शुरू कर दिया था। अंग्रेजों से संघर्ष करने के लिए गिन्दीलू ने अपनी सेना का गठन किया। उन्होनें लोगों को अंग्रेजों का सामान ढोने व ग्रहकर देने से मना किया। बड़ी संख्या में नागा युवक-युवतियां गिन्दीलू की सेना में सम्मिलित होने लगे। गिन्दीलू लोगों को समझाती थी कि न केवल विदेशी अंग्रेजों ने उन की आजादी छीन ली है वरन उनकी ही सहायता से चर्च नागाओं को ईसाई बनाने में लगा रखा है। गांधी जी के नेतृत्व में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के समाचार गिन्दीलू तक भी पहुंच रहे थे। जिनके मार्गदर्शन तथा आध्यात्मिक गुरु जादोनांग ने भविष्यवाणी कर दी थी कि अंग्रेजों को शीघ्र ही भगा दिया जाएगा। यह गिन्दीलू का अपने समाज जेलियांग्रांग पर पूरा प्रभाव था ही, इसी के साथ उन्होंने अन्य समुदायों को भी संगठित कर अपने साथ जोड़ लिया था। अंग्रेज पुलिस तथा जासूस जादोनांग तथा गिन्दीलू के पीछे पड़े थे। गिन्दीलू  इनसे बचते हुए अपना कार्य जारी रखे हुए थी। साथ ही वह गोरिल्ला युद्ध पद्धति से भी अभियान छेड़े हुए थी। अंग्रेज पुलिस या सेना पर अचानक आक्रमण करना तथा पहाड़ों में अदृश्य हो जाना तथा ये उनके सैनिकों का साधारण कार्य था। अंग्रेज पुलिस तथा सेना द्वारा किए विरोध किए जाने के कारण वे एक स्थान पर अधिक दिनों तक नहीं ठहर पाती थी। उनके भी जासूस बड़ी संख्या में थे जो अंग्रेजी पुलिस या सेना को पल-पल की जानकारी उन तक पहुंचाते थे। 16 मार्च 1932 को हंग्रुम गांव में असम राइफल्स तथा गिन्दीलू सेना के बीच मुठभेड़ हुई। असम राइफल्स के जवान बड़ी संख्या में मारे गए, हरक्का सेना के 7 जवान शहीद हुए थे। गिन्दीलू की सुरक्षा में तीन चक्र बनाए गए थे। अतः अंग्रेज सेना उन तक पहुंचने में कामयाब नहीं हो रही थी। गिन्दीलू ने अपना नाम बदलकर किरांगले तथा बाद में दिलेंल्यू भी रख लिया था ताकि अंग्रेजो को छकाया जा सके। उनके इस खुले विद्रोह को ब्रिटिश अधिकारियों से कठोर प्रतिक्रिया प्राप्त हुई। अंग्रेजों ने गिन्दीलू को पकड़ने के लिए तलाशी अभियान चलाया। यहां तक कि उन्हें पकड़ने के लिए एक मौलिक इनाम भी घोषित किया गया। साथ ही उनके बारे में जानकारी देने के बदले में 10 साल का कर विराम देने की घोषणा कर दी गई। गिन्दीलू पुलोमी (पोइलुमा) गांव में गुप्त रूप से रहते हुए एक लकड़ी का किला बनवा रही थी। जहां 5000 लोग एक साथ रह सके। नागा ब्रिटिश जासूस इसेजिंग्बे गिन्दीलू का अनुयाई बनकर समस्त जानकारी अंग्रेज पुलिस को भिजवा रहा था। हाल ही में ईसाई बने एक नागा डॉ. हरालु ने भी अंग्रेजों का सहयोग दिया। अंग्रेज सेना ने पुलोमी गांव को चारों ओर से घेर लिया था। बाद में कैप्टन मैकडॉनल्ड के नेतृत्व में असम राइफल्स की एक विशेष टुकड़ी को उन्हें पकड़ने के लिए भेजा गया। अंततः 17 अक्टूबर 1932 को, पुलोमी गांव से गिन्दीलू को पकड़कर लिया गया और जहां वह और उनके सहयोगी छिपे हुए थे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और हत्या तथा हत्या के लिए उकसाने के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उन्होंने गुवाहाटी शिलांग, आइजोल और तुरा जेलों में समय बिताया।

   1937 में शिलांग की यात्रा के दौरान जवाहरलाल नेहरू, गिन्दीलू से मिले और उनकी रिहाई के लिए प्रयास करने का वादा किया। इस मुलाकात के बाद नेहरू ने उनके साहस के लिए उन्हें “रानी” की उपाधि से सम्मानित किया और हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा प्रकाशित एक लेख में उन्हें पहाड़ों की बेटी के रूप में वर्णित किया गया। हालांकि गिन्दीलू की रिहाई के लिए नेहरू ने ब्रिटिश सांसद लेडी एस्टर को मनाने की कोशिश की लेकिन इसका कोई हल नहीं निकला। 15 वर्षों तक कारावास में रहने के पश्चात, आजाद होने पर 15 अगस्त 1947 को रानी गिन्दीलू को रिहा किया गया था। उस समय नागा लुसाई (मिजो), गारो, खासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रेरित भारत विरोधी आंदोलन चल रहा था। असम सरकार का मत था कि यदि रानी गिन्दीलू अपने क्षेत्र जेलियांग्रांग के लिए जाती है तो उक्त भारत विरोधी आंदोलन को बल मिलेगा। अत: रानी को रिहा करते समय उन पर शर्त लगा दी गई कि वे मणिपुर, नागा हिल्स, उत्तर कछार आदि क्षेत्रों में नहीं जा सकती। कितना दुर्भाग्य था कि रानी को सम्मानित करने के स्थान पर स्वतंत्र भारत में भी उन पर प्रतिबंध लगाया गया। उनकी भारत भक्ति पर शंका की गई। इन सब के पीछे चर्च का षड्यंत्र था। रानी जेल से रिहा होने के पश्चात अपने छोटे भाई खिडसिनांग के साथ यिमरूप गांव में रही। 1952 में प्रथम बार रानी को यिमरुप से बाहर जाने दिया गया। रानी गिन्दीलू के आने का समाचार पाकर लोग दूर-दूर से उनसे मिलने आने लगे। अब रानी गिन्दीलू समाज जागृति के काम में सक्रिय हो गई थी।

   चर्च तथा एन.एन.सी. दोनों मिलकर जेलियांग्रांग क्षेत्र के हिंदू नागाओं (जिन्हें संसारी कहा जाता था) को डरा धमका रहे थे तथा उन्हें ईसाई बनाने में लगे थे। उन्होंने गिन्दीलू को शैतान की पुजारिन बताया। रानी गिन्दीलू पादरियों के ईसाईकरण कार्य का विरोध कर रही थी। चर्च एन.एन.सी. ने उनकी हत्या का षड्यंत्र रचा। अतः अपने को सुरक्षित रखते हुए अपने कार्य को गति देने के लिए रानी गिन्दीलू को आजाद भारत में भी भूमिगत होना पड़ा। उन्होंने भूमिगत रहते हुए 1000 जवानों की सेना बनाई। इसमें 500 जवान राइफल धारी थे। रानी फिजो, एन.एन.एस. व चर्च के अलगाववादी आंदोलन का विरोध कर रहे थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि नागालैंड भारत का अभिन्न अंग है। बदलती परिस्थितियों में असम राइफल्स रानी का गुप्त रूप से सहयोग कर रही थी। अलगाववादियों से रानी की सेना की कई बार मुठभेड़ हुई। इसी बीच सितंबर 1964 में एन. एन. एस. व भारत सरकार के मध्य संघर्ष-विराम की घोषणा हुई थी।  अब असम सरकार चाहती थी की रानी गिन्दीलू भी अपना भूमिगत आंदोलन समाप्त कर दे। अंततः 20 जनवरी 1966 को रानी गिन्दीलू तथा उनके सैनिकों ने कोहिमा के डिप्टी कमिश्नर सुबोध चंद्र देव के सामने अपने हथियार सौंप दिए। रानी के साथ 300 सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था। इन सैनिकों को नागालैंड आर्म्ड पुलिस में भर्ती कर लिया गया। रानी गिन्दीलू ने घोषणा की कि वे भारत की नागरिक हैं उनका देश हिंदू हैं उनका धर्म सनातन है। नागालैंड सरकार ने रानी गिन्दीलू को सरकारी आवास दिया। एक कमांडर 10 सुरक्षा गार्ड, दो महिला सेविकाएं, एक निजी सचिव, एक क्लर्क, एक ड्राइवर सहित जीप दी। 

  1969 में असम के जोरहाट विश्व हिंदू परिषद में रानी गिन्दीलू ने भाग लिया। वहीं उनकी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन संघ चालक श्री गुरु जी से भेंट हुई। उसके बाद भी वह ऐसे सम्मेलनों में जाती रही। कई बार संघ के कार्यक्रमों में भी आई। रानी ने अयोध्या में  राममंदिर निर्माण का भी समर्थन किया। डिमापुरा के भारत सेवाश्रम संघ, रामकृष्ण मिशन, विवेकानंद केंद्र, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संगठनों से रानी के आत्मीय संबंध रहे। दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, नागपुर या अन्य कहीं भी रानी गिन्दीलू जब गई तो वे अपने संबोधन में हिंदू होने का परिचय देते हुए कहती थी कि नागालैंड में सब लोग ईसाई नहीं है। इसाईयों के मतांतरण को रोकने में वह सहयोग भी मांगती थी। रानी मां से प्रभावित होकर हरक्का समाज की लड़कियों ने अविवाहित रहकर देशहित में अपना जीवन लगाने का व्रत लिया। रानी ने जेलियाग्रांग हेक्का एसोसिएशन का गठन कर हरक्का मत का प्रचार-प्रसार जारी रखा। 

निष्कर्ष:-

     भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में रानी गिन्दीलू के योगदान को भारत सरकार ने मान्यता दी है। उन्हें ताम्रपत्र (1972), पद्म भूषण (1982), विवेकानंद सेवा सम्मान (1983) और 1996 में भगवान बिरसा मुंडा पुरस्कार (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया। 1996 में, एक संस्मारक डाक टिकट जारी किया गया था और 26 जनवरी 2015 को उनके जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में उन्हें सम्मान देने हेतु, संस्मारक सिक्के भी जारी किए गए थे। रानी गिन्दीलू को भारत सरकार ने इतिहास की पाँच प्रमुख वीरांगना नारियों में शामिल करने की घोषणा की तथा ईन वीरांगनाओं के सम्मान में स्त्री शक्ति पुरस्कार प्रारंभ किया| ये पाँच महान नारियां है:- कन्नगि, माता जीजिबाई, अहिल्या बाई होल्कर, रानी लक्ष्मीबाई तथा रानी गिन्दीलू| 17 फरवरी, 1993 को रानी गिन्दीलूने अंतिम सांस ली| 2016 में भारतीय तटरक्षक बल ने आई.सी.जी.एस. रानी गिन्दीलू नामक एक तेज गश्ती पोत को अधिकृत किया गया था। हाल ही में, स्वतंत्रता सेनानियों को समर्पित एक संग्रहालय के निर्माण के लिए एक परियोजना को मंजूरी दी गई थी। यह उनके जन्म स्थान पर बनाया जाएगा। इसका नाम रानी गिन्दीलू जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय होगा।

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