महिला जातक, पालक और तारक

महिला जातक, पालक और तारक:
 भारतीय समाज और ज्ञान परंपरा के प्राचीन साहित्य और धर्मग्रंथों में महिला को केवल जीवनदाता ही नहीं, बल्कि मूल्य और संस्कारों की पालक तथा समाज सुधार की तारक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
भारतीय इतिहास के विविध उदाहरण इस तथ्य को बल देते हैं। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी अपने ज्ञान से दार्शनिक चर्चाओं का संचालन करती थीं। राजमाता जीजाबाई ने न केवल शिवाजी को जन्म दिया बल्कि उन्हें संस्कार और शिक्षा देकर राष्ट्र की रक्षा का संकल्प भी प्रदान किया। इन प्रसंगों से स्पष्ट है कि महिला अपने मातृत्व से जातक है, अपने पालन-पोषण और संस्कार से पालक है, और अपने त्याग तथा नेतृत्व से तारक है।
वर्तमान संदर्भ में यह दृष्टि और भी प्रासंगिक हो जाती है। आधुनिक शिक्षा और नई पीढ़ी के व्यक्तित्व निर्माण में महिलाओं की भूमिका अनिवार्य है। कार्यस्थल से लेकर परिवार तक उनके निर्णय समाज की दिशा तय करते हैं। बेटी-बचाओ, शिक्षा-प्रचार और महिला-सशक्तिकरण जैसे अभियानों में महिलाएं स्वयं आगे बढ़कर दूसरों के लिए प्रेरणा बन रही हैं।
अतः कहा जा सकता है कि महिला केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की स्थिरता और गतिशीलता का केंद्र है। उनकी जातक भूमिका समाज को जीवन देती है, पालक भूमिका उसे संस्कारित करती है और तारक रूप उसे उन्नति और मोक्ष की दिशा दिखाती है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में नारी को "शक्ति" और "मंगलमयी" की संज्ञा दी गई है।
डॉ. विनी शर्मा, सहायकाचार्या,केंदीय संस्कृत विश्वविद्यालय, हिन्दी प्रचार प्रसार संस्थान

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