राजनीति विज्ञान की प्रमुख अवधारणाएं(लोकतंत्र, नागरिकता)

3. राजनीति विज्ञान की प्रमुख अवधारणाएं

(लोकतंत्र, नागरिकता)

डॉ.  विनी शर्मा

सहायकाचार्या राजनीति विज्ञान

केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालया, दिल्ली, जयपुर परिसर

लोकतंत्र

2 नम्बर के प्रश्न:उत्तर

1.   लोकतंत्र शाब्दिक अर्थ लिखिए।

उत्तर: लोकतंत्र का अंग्रेजी पर्याय डेमोक्रेसी (Democracy) है जो दो यूनानी शब्दों से मिलकर बना है डेमो (Demo) यानी जनता क्रेटिया(Kratia) यानी शक्ति अथवा शासन इस प्रकार लोकतंत्र का अर्थ है जनता का शासन अथवा एक ऐसी शासन प्रणाली इसमें सर्वोच्च सत्ता जनता के पास हो।

2.   लोकतंत्र को परिभाषित कीजिए।

उत्तर: अब्राहम लिंकन ने “लोकतंत्र को जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन कहा है।“

सिले के अनुसार “लोकतंत्र वह शासन व्यवस्था है जिसमें हर व्यक्ति हाथ बटाता हो।“

लॉर्ड ब्राइस के अनुसार “लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली है का नाम है जिसमें राजसत्ता किसी एक वर्ग या किन्हीं खास वर्गों के हाथ में न होकर समुचित जनता के हाथों में होती है।“

3.    प्रत्यक्ष लोकतंत्र क्या है?

उत्तर: इसमें जनता स्वयं कानून बनाती और शासन करती है, जैसे प्राचीन एथेंस, स्विट्ज़रलैंड।

4.    प्रतिनिधिक लोकतंत्र क्या है?

उत्तर: इसमें जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर शासन का अधिकार देती है, जैसे भारत, अमेरिका।

5.    जनमत संग्रह (Referendum) किस लोकतंत्र की विशेषता है?

उत्तर: यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र की विशेषता है।

6.    प्रतिनिधिक लोकतंत्र का एक लाभ लिखिए।

उत्तर: बड़े और जटिल समाजों में यह लोकतंत्र को व्यावहारिक बनाता है।

7.    लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार क्या है?

उत्तर: जनता की सहमति और सहभागिता लोकतंत्र का आधार है।

8.    लोकतंत्र में बहुमत सिद्धांत का क्या अर्थ है?

उत्तर: नीतियाँ और निर्णय बहुमत की इच्छा से लिए जाते हैं।

9.    लोकतंत्र में विपक्ष की क्या भूमिका है?

उत्तर: विपक्ष सरकार की गलतियों की आलोचना कर जनता के हितों की रक्षा करता है।

10.                  उदारवादी लोकतंत्र किस पर आधारित है?

उत्तर: व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार और विधि के शासन पर।

11.                  मार्क्सवादी दृष्टि में लोकतंत्र क्या है?

उत्तर: पूँजीवादी समाज में लोकतंत्र शोषक वर्ग का औजार है।

12.                  लोकतंत्र में समानता का क्या महत्व है?

उत्तर: प्रत्येक नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार मिलते हैं।

13.                  भारत किस प्रकार का लोकतंत्र है?

उत्तर: भारत एक संघीय, संसदीय और प्रतिनिधिक लोकतंत्र है।

14.                  लोकतंत्र में चुनाव की क्या आवश्यकता है?

उत्तर: चुनाव जनसहमति प्रकट करने और प्रतिनिधि चुनने का माध्यम है।

15.                  लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?

उत्तर: बहुमत की तानाशाही और जनप्रियवाद (Populism) लोकतंत्र की कमजोरी है।

16.                  उदारवादी लोकतंत्र किस पर आधारित है?

उत्तर: उदारवादी लोकतंत्र व्यक्तिगत स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार, विधि का शासन और बहुमत सिद्धांत पर आधारित है।

17.                 मार्क्सवादी लोकतंत्र का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: मार्क्सवादी लोकतंत्र का उद्देश्य वर्गहीन और शोषणमुक्त समाज की स्थापना है।

18.                  मार्क्सवादी दृष्टि में उदारवादी लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमी क्या है?

उत्तर: यह पूँजीपति वर्ग के हितों को सुरक्षित करता है और मजदूर वर्ग का शोषण करता है।

19.                  अभिजनवादी (Elite) लोकतंत्र का मुख्य विचार क्या है?

उत्तर: वास्तविक सत्ता जनता के पास नहीं होती, बल्कि कुछ अभिजनों (विशेष वर्ग/Elite) के हाथों में रहती है।

20.                  अभिजनवादी सिद्धांत के प्रमुख विचारक कौन हैं?

उत्तर: गैटानो मोस्का, विलफ्रेडो पैरेटो और रॉबर्ट मिचेल्स।

21.                  बहुलवादी लोकतंत्र (Pluralist Democracy) किसे मान्यता देता है?

उत्तर: यह मानता है कि समाज में अनेक समूह होते हैं और लोकतंत्र इन्हीं समूहों के बीच संतुलन बनाता है।

22.                  बहुलवादी लोकतंत्र के प्रमुख समर्थक कौन हैं?

उत्तर: हैरोल्ड लास्की, आर्थर बेंटली और गेटलिन।

23.                   सहभागी लोकतंत्र (Participatory Democracy) का मुख्य लक्ष्य क्या है?

उत्तर: इसमें जनता को निर्णय प्रक्रिया में सीधे भागीदारी का अवसर देना।

24.                 रक्षात्मक (Protective) लोकतंत्र किस विचार पर आधारित है?

उत्तर: यह लोकतंत्र व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की सुरक्षा पर जोर देता है।

25.                 विकासोन्मुख (Developmental) लोकतंत्र की विशेषता क्या है?

उत्तर: यह नागरिकों के नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास पर जोर देता है।

5 और 10 नम्बर के प्रश्न-उत्तर

1.    लोकतंत्र के विभिन्न पहलुओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

·       राजनीतिक पहलू

·       सामाजिक पहलू

·       मनोवैज्ञानिक पहलू

·       आर्थिक पहलू

2.   लोकतंत्र के विभिन्न रूपों का वर्णन कीजिए।

अथवा

प्रत्यक्ष और प्रतिनिधिक लोकतंत्र को समझाइए।

उत्तर: प्रत्यक्ष लोकतंत्र:

प्रत्यक्ष लोकतंत्र वह शासन प्रणाली है जिसमें नागरिक सीधे शासन और नीति–निर्माण की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। इसमें जनता स्वयं कानून बनाती है, निर्णय लेती है और शासन में भाग लेती है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण प्राचीन ग्रीस का एथेंस तथा वर्तमान में स्विट्ज़रलैंड है। प्रत्यक्ष लोकतंत्र के प्रमुख उपकरण हैं – जनमत संग्रह (Referendum), जन पहल (Initiative), जनमत–विलोकन (Recall)।

प्रतिनिधिक लोकतंत्र:

प्रतिनिधिक लोकतंत्र वह शासन प्रणाली है जिसमें जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर शासन का अधिकार उन्हें सौंप देती है। प्रतिनिधि नागरिकों की ओर से संसद और विधानसभाओं में नीति–निर्माण करते हैं। इसका उदाहरण भारत, अमेरिका, ब्रिटेन आदि देश हैं।

निष्कर्ष: प्रत्यक्ष लोकतंत्र छोटे राज्यों और जनसंख्या में कम समाजों के लिए उपयुक्त है, जबकि बड़े और विविध समाजों में प्रतिनिधिक लोकतंत्र अधिक व्यवहारिक और प्रभावी है।

3.   लोकतंत्र का उदारवादी सिद्धांत समझाइए।

उत्तर: जे.एस. मिल लोकतंत्र को शासन का आदर्श रूप मानता है। हॉबहाउस, लास्की और मैंकाइवर भी उदार लोकतंत्र के ही समर्थक थे। उदार लोकतांत्रिक देश में एक से अधिक राजनीतिक दल होते हैं तथा बालिक मताधिकार पर आधारित चुनाव समय-समय पर होते रहते हैं। उदार लोकतंत्र के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं:

1)   जनता स्वयं अपने भाग्य का निर्धारण करती है

2)   अधिकार और स्वतंत्रता की रक्षा

3)   शासन का आधार विवेक है न कि बल प्रयोग

4)   जनता का राजनीतिक शिक्षण संभव

5)   जनता का नैतिक विकास

उदार लोकतंत्र की आलोचना: उदार लोकतंत्र की आलोचना इसलिए की जाती है कि उसमें अयोग्यता की पूजा होती है। इसके अतिरिक्त राजनीतिक शक्ति पर धन हावी हो गया है।

1)   अयोग्यता की पूजा होती है

2)   लोकतंत्र वास्तव में जनता का शासन है ही नहीं

3)   ढीली और कुशल शासन व्यवस्था

4)   दाल बंदी के दोष और अस्थाई सरकारें

5)   समय और धन की हानि

उदार लोकतंत्र की सफलता की आवश्यक शर्तें:-

1)   कुछ मूलभूत बातों पर सहमति

2)   नागरिकों का उच्च चरित्र नागरिक

3)   नागरिक स्वतंत्रताएं

4)   स्वस्थ दल बंदी

5)   प्रभावी विरोधी दल

6)   सामाजिक आर्थिक सुरक्षा।

4.    लोकतंत्र मार्क्सवादी सिद्धांत की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए। / उदार लोकतांत्रिक सिद्धांत के मार्क्सवादी आलोचना का विवेचन कीजिए।

उत्तर: लोकतंत्र (Democracy) आधुनिक राजनीति की केंद्रीय अवधारणा है। उदारवादी दृष्टिकोण इसे व्यक्तिगत अधिकारों, स्वतंत्रता और जनसहमति पर आधारित मानता है, जबकि मार्क्सवादी दृष्टिकोण लोकतंत्र को वर्ग-संघर्ष की दृष्टि से देखता है। मार्क्सवादी विचारकों के अनुसार पूँजीवादी समाज में लोकतंत्र केवल “शोषक वर्ग” का उपकरण है, जिसका उद्देश्य श्रमिक वर्ग को नियंत्रित रखना और पूँजीवादी ढाँचे को बनाए रखना है।

मार्क्सवादी लोकतंत्र की मूल धारणा:

1. वर्ग-आधारित लोकतंत्र – मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार राज्य स्वयं एक वर्ग का उपकरण है। अतः लोकतंत्र भी शासक वर्ग (बुर्जुआ वर्ग) के हितों की रक्षा करता है।

2. औपचारिक बनाम वास्तविक लोकतंत्र – पूँजीवादी लोकतंत्र केवल औपचारिक समानता (एक व्यक्ति एक मत) देता है, जबकि वास्तविक जीवन में आर्थिक असमानताएँ बनी रहती हैं।

3. सर्वहारा लोकतंत्र – मार्क्सवादियों ने “सर्वहारा की तानाशाही” (Dictatorship of Proletariat) की अवधारणा दी, जिसमें श्रमिक वर्ग उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण स्थापित कर वास्तविक लोकतंत्र की नींव रखता है।

4. समाजवादी लोकतंत्र – लेनिन और अन्य मार्क्सवादी चिंतकों ने कहा कि वास्तविक लोकतंत्र तभी संभव है जब उत्पादन और संसाधनों का सामूहिक स्वामित्व हो तथा वर्गविहीन समाज का निर्माण किया जाए।

मार्क्सवादी लोकतंत्र की विशेषताएँ:

·       आर्थिक और सामाजिक समानता पर बल।

·       काम का अधिकार

·       विश्राम का अधिकार

·       बुढ़ापे व बीमारी की स्थिति में राज्य की ओर से पोषण का अधिकार

·       निजी संपत्ति का उन्मूलन।

·       मजहबी आजादी

·       परिवारों को राज्य का संरक्षण

·       स्वास्थ्य रक्षा का अधिकार जिसमें नि: शुल्क चिकित्सा सुविधा

·       शिक्षा पाने का अधिकार

·       सांस्कृतिक उपलब्धियों से लाभ उठाए का अधिकार

·       श्रमिक वर्ग की सत्ता में भागीदारी।

·       क्रांतिकारी परिवर्तन के माध्यम से सत्ता पर कब्ज़ा।

आलोचनाएँ

1. तानाशाही प्रवृत्ति – मार्क्सवादी लोकतंत्र “सर्वहारा की तानाशाही” के नाम पर राजनीतिक स्वतंत्रताओं को सीमित कर देता है।

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभाव – इसमें अभिव्यक्ति, संगठन और बहुदलीय व्यवस्था जैसी स्वतंत्रताओं को अक्सर दबा दिया जाता है।

3. व्यावहारिक विफलता – सोवियत संघ और अन्य साम्यवादी देशों में लोकतंत्र श्रमिकों तक सीमित न रहकर एकदलीय तानाशाही में बदल गया।

4. लोकतांत्रिक विविधता की उपेक्षा – यह मान लिया गया कि केवल आर्थिक समानता ही लोकतंत्र है, जबकि सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यक्तिगत अधिकार भी लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं।

5. सर्वाधिकारवादी व्यवस्था

6. विस्तारवादी नीति

7. आदर्श और व्यवहार में अंतर – जहाँ मार्क्सवाद आदर्श रूप से वर्गविहीन समाज और पूर्ण समानता की बात करता है, वहीं व्यवहार में यह राज्य की कठोर सत्ता और असहमति के दमन का साधन बन गया।

निष्कर्ष: मार्क्सवादी लोकतंत्र का उद्देश्य वास्तविक सामाजिक और आर्थिक समानता स्थापित करना है, जो केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित न रहकर जीवन के हर क्षेत्र में समान अवसर प्रदान करे। परन्तु इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि व्यवहार में यह लोकतंत्र के मूलभूत तत्व — स्वतंत्रता, बहुलता और सहमति — को कमज़ोर कर देता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि मार्क्सवादी लोकतंत्र का आदर्श तो आकर्षक है, पर व्यावहारिक अनुभव में यह अक्सर तानाशाही का रूप धारण कर लेता है।

5.   लोकतंत्र का विशिष्टवर्गवादी सिद्धांत/अभिजनवादी अवधारणा पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर: लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गवादी सिद्धांत / अभिजनवादी अवधारणा:

लोकतंत्र सामान्यतः “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन” (Government of the people, for the people and by the people) माना जाता है। परंतु 20वीं शताब्दी में कुछ विद्वानों ने लोकतंत्र की पारंपरिक अवधारणा की आलोचना करते हुए यह तर्क दिया कि वास्तविकता में शासन जनता का नहीं बल्कि एक छोटे से विशिष्ट वर्ग (Elite / श्रेष्ठ जन/अभिजन) का होता है। इसे ही लोकतंत्र का विशिष्ट वर्गवादी अथवा अभिजनवादी सिद्धांत कहा जाता है।

विशिष्ट वर्गवादी सिद्धांत का उद्भव: इस सिद्धांत को सबसे पहले गाएटो मोस्का (Gaetano Mosca), विल्फ्रेडो पैरेटो (Vilfredo Pareto) और रॉबर्ट माइकल्स (Robert Michels) जैसे विद्वानों ने प्रस्तुत किया। इनका तर्क था कि समाज में हमेशा एक अल्पसंख्यक वर्ग शासन करता है जबकि बहुसंख्यक वर्ग शासित रहता है।

मुख्य तर्क और विशेषताएँ:

1.    आमतौर पर विशिष्ट वर्ग में इस तरह के लोग शामिल हैं उच्च प्रशासनिक अधिकारी उच्च सैन्य अधिकारी धर्माधिकारी औद्योगिक घरानों के मालिक आयात-निर्यात, व्यापार में संलग्न व्यक्ति बड़े-बड़े जमींदार तथा राजनीतिक दलों के पूज्य प्राधिकारी।

2.    शासक और शासित का विभाजन – मोस्का के अनुसार हर समाज में दो वर्ग पाए जाते हैं:

·       शासक अल्पसंख्यक (Ruling Minority)

·       शासित बहुसंख्यक (Ruled Majority)

2. अभिजनों का प्रभुत्व – पारेतो के अनुसार समाज में “श्रेष्ठ पुरुष” (Elites) अपनी प्रतिभा, योग्यता और शक्ति के आधार पर शासन पर अधिकार कर लेते हैं।

3. अभिजनों का परिभ्रमण (Circulation of Elites) – पैरेटो का मानना था कि समय–समय पर पुराने अभिजनों की जगह नए अभिजन ले लेते हैं। लोकतंत्र भी इसी प्रक्रिया का एक रूप है।

4. अल्पतंत्र का लौह नियम (Iron Law of Oligarchy) – रॉबर्ट माइकल्स के अनुसार किसी भी संगठन या राजनीतिक दल में निर्णय लेने की शक्ति धीरे–धीरे कुछ व्यक्तियों के हाथों में केंद्रित हो जाती है। इसलिए लोकतंत्र वास्तव में अल्पतंत्र (Oligarchy) में बदल जाता है।

5. जनता की निष्क्रिय भूमिका – इस दृष्टिकोण में आम जनता केवल चुनावों में वोट देकर अपनी सहमति प्रकट करती है, लेकिन वास्तविक निर्णय–निर्माण पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता।

6. विशिष्ट वर्ग सत्ता पर एकाधिकार रखता है: जे.. शूम्पीटर “चुनावों के माध्यम से लोगों को सिर्फ यह अवसर मिलता है की किन्हीं खास विशिष्ट लोगों को हटाकर उनके स्थान पर दूसरे किन्ही विशिष्ट लोगों को राज सिंहासन पर बैठा दें।“ इसे विशिष्ट लोगों के संचरण का सिद्धांत भी कहते हैं

 महत्व:

·       यह सिद्धांत लोकतंत्र की यथार्थवादी व्याख्या करता है।

·       यह दर्शाता है कि आधुनिक जटिल समाज में प्रत्यक्ष जन-शासन संभव नहीं है।

·       अभिजन वर्ग ही नीतियों और निर्णयों का निर्माण करता है, जबकि जनता केवल उन्हें चुनती है।

आलोचनाएँ

1. यह सिद्धांत लोकतंत्र के आदर्शवादी मूल्यों (समानता, जनसत्ता) की उपेक्षा करता है।

2. यह जनता की भूमिका को निष्क्रिय और नगण्य मानता है।

3. व्यावहारिक अनुभव यह दर्शाते हैं कि जनता जन–आंदोलनों और चुनावों के माध्यम से अभिजनों को चुनौती भी देती है।

4. यह सिद्धांत लोकतंत्र की उत्तरदायित्व और पारदर्शिता की विशेषताओं को नहीं मानता।

निष्कर्ष: विशिष्ट वर्गवादी अथवा अभिजनवादी सिद्धांत लोकतंत्र की व्यावहारिक सीमाओं और यथार्थ को सामने लाता है। यह बताता है कि वास्तविक सत्ता सदैव एक छोटे अभिजन वर्ग के हाथों में रहती है। तथापि, लोकतंत्र की सफलता इसी में है कि जनता समय–समय पर चुनावों और आंदोलनों के माध्यम से अभिजनों को नियंत्रित कर सके। अतः लोकतंत्र को केवल अभिजनवादी दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे जनता की सहभागिता और जन-आंदोलनों से भी परिपूर्ण समझना चाहिए।

6.    विकासशील देशों में लोकतंत्र के रूप पर एक लघु निबंध लिखिए।

उत्तर: विकासशील देशों में लोकतंत्र का स्वरूप:

लोकतंत्र आधुनिक युग का सर्वाधिक चर्चित और स्वीकृत शासन-तंत्र है। परंतु इसका स्वरूप सभी देशों में समान नहीं है। विकसित देशों में जहाँ लोकतंत्र स्थिर, परिपक्व और संस्थागत रूप ले चुका है, वहीं विकासशील देशों (जैसे भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, नाइजीरिया, ब्राजील आदि) में लोकतंत्र का स्वरूप भिन्न है। इन देशों में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को विशेष रूप प्रदान किया है।

विकासशील देशों में लोकतंत्र की विशेषताएँ:

1. औपनिवेशिक विरासत:

अधिकांश विकासशील देशों ने लोकतंत्र की यात्रा औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के बाद प्रारंभ की। स्वतंत्रता के पश्चात् उन्होंने पश्चिमी लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपनाया, परंतु स्थानीय परंपराओं और चुनौतियों के कारण लोकतंत्र का स्वरूप मिश्रित हो गया।

2. बहुदलीयता और अस्थिरता:

इन देशों में अक्सर राजनीतिक दलों की बहुलता देखने को मिलती है, परंतु दलों में अनुशासन की कमी और व्यक्तिगत नेतृत्व की प्रवृत्ति लोकतंत्र को अस्थिर बना देती है।

3. गरीबी और निरक्षरता का प्रभाव:

विकासशील देशों की बड़ी जनसंख्या गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी से ग्रसित है। इन कारणों से जनता लोकतंत्र में सक्रिय और सजग भूमिका नहीं निभा पाती।

4. जातीय, भाषायी और धार्मिक विविधता:

इन देशों में सामाजिक विविधता अधिक होती है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यह विविधता कई बार सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता और जातिवाद के रूप में बाधा डालती है।

5. शक्तियों का केंद्रीकरण:

यद्यपि लोकतंत्र सत्ता के विकेंद्रीकरण पर बल देता है, परंतु विकासशील देशों में राजनीतिक सत्ता प्रायः केंद्रित रहती है। इससे स्थानीय स्वशासन और सहभागिता कमजोर हो जाती है।

6. जनप्रिय राजनीति

विकासशील देशों में नेता: अक्सर जनता को आकर्षित करने के लिए जनप्रिय वादे और नीतियाँ अपनाते हैं। इससे लोकतंत्र में स्थिरता की बजाय अस्थिरता और भ्रष्टाचार पनपते हैं।

7. लोकतंत्र और विकास का संबंध:

इन देशों में लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक और सामाजिक विकास का भी माध्यम है। शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी-उन्मूलन और सामाजिक न्याय जैसी नीतियाँ लोकतंत्र के एजेंडे में शामिल होती हैं।

आलोचनात्मक पक्ष:

·       लोकतंत्र यहाँ कई बार औपचारिक रूप में रह जाता है, जहाँ चुनाव तो होते हैं परंतु जनता का वास्तविक सशक्तिकरण नहीं होता।

·       सैन्य हस्तक्षेप और तानाशाही (जैसे पाकिस्तान, म्यांमार) ने लोकतंत्र को कमजोर किया है।

·       भ्रष्टाचार और परिवारवाद लोकतंत्र की आत्मा को आहत करते हैं।

भारत का उदाहरण:

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ लोकतंत्र ने गरीबी, विविधता और चुनौतियों के बावजूद अपनी जड़ें मजबूत की हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा भारत के लोकतंत्र की विशेषता है।

निष्कर्ष: विकासशील देशों में लोकतंत्र अभी संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। यहाँ लोकतंत्र केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का साधन भी है। यदि भ्रष्टाचार, गरीबी और असमानता जैसी समस्याओं पर नियंत्रण किया जाए और जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए, तो विकासशील देशों में लोकतंत्र न केवल स्थिर होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर आदर्श भी प्रस्तुत करेगा।

नागरिकता

2 नम्बर के प्रश्न:उत्तर

प्रश्न 1. अरस्तू को किस नाम से जाना जाता है?

उत्तर: अरस्तू को "राजनीति का जनक" कहा जाता है।

प्रश्न 2. अरस्तू की नागरिकता संबंधी विचार किस ग्रंथ में मिलते हैं?

उत्तर: अरस्तू की पुस्तक ‘पॉलिटिक्स’ (Politics) में।

प्रश्न 3. अरस्तू ने राज्य को किस प्रकार की संस्था माना?

उत्तर: अरस्तू ने राज्य को नैतिक संस्था (Moral Institution) माना।

प्रश्न 4. अरस्तू के अनुसार नागरिकता किससे निर्धारित होती है?

उत्तर: राज्य की राजनीतिक क्रियाओं में भागीदारी से।

प्रश्न 5. अरस्तू ने नागरिक को कैसे परिभाषित किया?

उत्तर: जो व्यक्ति न्यायालय और सभा में भाग ले सकता है, वही नागरिक है।

प्रश्न 6. अरस्तू के अनुसार "नागरिकता" किससे जुड़ी है?

उत्तर: कर्तव्यों और अधिकारों से।

प्रश्न 7. अरस्तू ने नागरिकता की आधारभूत इकाई किसे माना?

उत्तर: "पोलिस" (नगर-राज्य)।

प्रश्न 8. अरस्तू के अनुसार, कौन नागरिक नहीं माना जा सकता?

उत्तर: दास, स्त्रियाँ और विदेशी।

प्रश्न 9. अरस्तू के अनुसार नागरिकता की सबसे बड़ी शर्त क्या है?

उत्तर: राज्य की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी।

प्रश्न 10. अरस्तू ने अच्छे नागरिक और अच्छे मनुष्य में क्या अंतर बताया?

उत्तर: अच्छा नागरिक राज्य का आज्ञाकारी होता है, जबकि अच्छा मनुष्य नैतिकता का पालन करता है।

प्रश्न 11. अरस्तू ने नागरिकता को स्थायी माना या बदलने योग्य?

उत्तर: बदलने योग्य, क्योंकि शासन व्यवस्था के बदलने पर नागरिकता की परिभाषा भी बदल जाती है।

प्रश्न 12. अरस्तू ने किस शासन में अधिक नागरिकों की भागीदारी की बात कही?

उत्तर: लोकतांत्रिक शासन में।

प्रश्न 13. अरस्तू के अनुसार नागरिकता का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: राज्य और व्यक्ति दोनों के विकास में योगदान देना।

प्रश्न 14. अरस्तू ने नागरिकता को किस प्रकार का विचार माना?

उत्तर: व्यावहारिक और राजनीतिक विचार।

प्रश्न 15. अरस्तू की नागरिकता की अवधारणा की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?

उत्तर: नागरिकता को राजनीतिक भागीदारी से जोड़ना।

5 नम्बर के प्रश्न:उत्तर

प्रश्न 1. अरस्तू ने राज्य को किस प्रकार की संस्था माना और इसका नागरिकता से क्या संबंध है?

उत्तर: अरस्तू ने राज्य को एक नैतिक संस्था (Moral Institution) माना। उनके अनुसार राज्य केवल शक्ति या सुरक्षा का साधन नहीं है, बल्कि यह मानव की नैतिक और सामाजिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने वाला संगठन है। नागरिकता का वास्तविक अर्थ है – राज्य की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी। इसलिए नागरिक केवल वह है जो सभा और न्यायालय में हिस्सा ले सके। इस प्रकार, राज्य की नैतिकता और नागरिक की जिम्मेदारियाँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं।

प्रश्न 2. अरस्तू के अनुसार नागरिकता की परिभाषा क्या है?

उत्तर: अरस्तू ने कहा कि नागरिक वही व्यक्ति है जिसे न्यायालय और सभा में भाग लेने का अधिकार हो। उनके अनुसार नागरिकता केवल जन्म से नहीं, बल्कि राजनीतिक अधिकारों से निर्धारित होती है। इसका अर्थ यह है कि नागरिकता केवल निवास या धन-संपत्ति पर आधारित नहीं है, बल्कि राजनीतिक जीवन में भागीदारी पर आधारित है। अरस्तू की परिभाषा आधुनिक नागरिकता की आधारशिला है, क्योंकि इसमें अधिकार और कर्तव्य दोनों को स्थान दिया गया है।

प्रश्न 3. अरस्तू ने "अच्छे नागरिक" और "अच्छे मनुष्य" में क्या अंतर बताया?

उत्तर: अरस्तू के अनुसार "अच्छा नागरिक" वह है जो राज्य की नीतियों और शासन का पालन करता है तथा शासन व्यवस्था की रक्षा करता है। दूसरी ओर, "अच्छा मनुष्य" वह है जो नैतिक मूल्यों और आदर्श जीवन का अनुसरण करता है। कभी-कभी दोनों में समानता हो सकती है, लेकिन हमेशा नहीं। उदाहरणतः एक निरंकुश राज्य का अच्छा नागरिक जरूरी नहीं कि अच्छा मनुष्य भी हो। इस प्रकार अरस्तू ने नागरिकता की राजनीतिक भूमिका और नैतिकता की मानवीय भूमिका में अंतर स्पष्ट किया।

प्रश्न 4. अरस्तू के अनुसार नागरिकता का आधार क्या है?

उत्तर: अरस्तू ने नागरिकता का आधार राजनीतिक अधिकार और कर्तव्य माना। उनके अनुसार नागरिक वही है जो न्यायालय में निर्णय ले सके और सभा में भाग ले सके। उन्होंने नागरिकता को केवल जन्म, संपत्ति या जाति पर आधारित मानने से इनकार किया। नागरिकता का आधार सक्रिय भागीदारी है, जिससे राज्य और नागरिक दोनों का विकास होता है। यह दृष्टिकोण लोकतांत्रिक विचारधारा का पूर्वाभास है।

प्रश्न 5. अरस्तू ने किन्हें नागरिक मानने से इनकार किया और क्यों?

उत्तर: अरस्तू ने दासों, महिलाओं और विदेशियों को नागरिक नहीं माना। उनके अनुसार दास और स्त्रियाँ निजी जीवन में कार्यरत रहती हैं और राजनीतिक निर्णयों में भाग लेने योग्य नहीं मानी जातीं। विदेशी राज्य के हितों के प्रति निष्ठावान नहीं हो सकते। यद्यपि यह दृष्टिकोण आज के समय में सीमित और आलोचनात्मक है, लेकिन प्राचीन नगर-राज्यों की परिस्थितियों में यह विचार सामान्य था।

प्रश्न 6. अरस्तू की नागरिकता में "पोलिस" की क्या भूमिका थी?

उत्तर: अरस्तू ने नगर-राज्य या "पोलिस" को नागरिकता की आधारशिला माना। उनके अनुसार व्यक्ति तभी नागरिक कहलाता है जब वह पोलिस की राजनीतिक गतिविधियों में भाग ले सके। पोलिस केवल शासन का ढांचा नहीं था, बल्कि शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक जीवन का केंद्र भी था। इसीलिए नागरिकता पोलिस से गहराई से जुड़ी थी।

प्रश्न 7. अरस्तू ने नागरिकता को स्थायी या परिवर्तनशील माना?

उत्तर: अरस्तू के अनुसार नागरिकता स्थायी नहीं बल्कि परिवर्तनशील है। शासन व्यवस्था के बदलने पर नागरिकता की परिभाषा भी बदल जाती है। उदाहरणतः लोकतंत्र में सभी वयस्क नागरिक होते हैं, जबकि अभिजनतंत्र में केवल अभिजात वर्ग ही नागरिक होता है। इससे स्पष्ट है कि नागरिकता राजनीतिक व्यवस्था पर निर्भर करती है।

प्रश्न 8. अरस्तू की नागरिकता का मुख्य उद्देश्य क्या था?

उत्तर: अरस्तू का मानना था कि नागरिकता का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति और राज्य दोनों का विकास करना है। नागरिक को केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए। इस प्रकार नागरिकता व्यक्ति को राज्य के नैतिक और राजनीतिक जीवन से जोड़ती है और "सद्गुणी जीवन" जीने में सहायता करती है।

प्रश्न 9. अरस्तू की नागरिकता और आधुनिक नागरिकता में क्या समानता है?

उत्तर: अरस्तू की नागरिकता और आधुनिक नागरिकता में समानता यह है कि दोनों में राजनीतिक अधिकार और भागीदारी को महत्व दिया गया है। जैसे आधुनिक लोकतंत्र में मतदान और निर्णय-प्रक्रिया में भाग लेना नागरिकता का प्रतीक है, वैसे ही अरस्तू ने सभा और न्यायालय में भागीदारी को नागरिकता की शर्त माना।

प्रश्न 10. अरस्तू की नागरिकता और आधुनिक नागरिकता में क्या अंतर है?

उत्तर: आधुनिक नागरिकता सार्वभौमिकता पर आधारित है, जहाँ सभी वयस्क पुरुष और स्त्रियाँ नागरिक माने जाते हैं। जबकि अरस्तू ने दासों, स्त्रियों और विदेशियों को नागरिकता से बाहर रखा। आधुनिक दृष्टि से अरस्तू की अवधारणा सीमित और असमान मानी जाती है।

प्रश्न 11. अरस्तू की नागरिकता में न्यायालय और सभा की क्या भूमिका थी?

उत्तर: अरस्तू ने नागरिकता की पहचान न्यायालय और सभा में भागीदारी से की। न्यायालय कानून और विवादों का निपटारा करता था, जबकि सभा राज्य की नीतियों और निर्णयों को निर्धारित करती थी। नागरिक का सक्रिय योगदान इन दोनों संस्थाओं में उसकी राजनीतिक स्थिति को सुनिश्चित करता था।

प्रश्न 12. अरस्तू ने किस शासन व्यवस्था में अधिक नागरिकों की भागीदारी मानी?

उत्तर: अरस्तू ने लोकतांत्रिक शासन में अधिक नागरिकों की भागीदारी मानी। लोकतंत्र में सामान्य व्यक्ति भी सभा और न्यायालय का हिस्सा बन सकता था। जबकि अभिजनतंत्र या राजतंत्र में केवल सीमित वर्ग नागरिक कहलाते थे।

प्रश्न 13. अरस्तू के अनुसार नागरिकता और नैतिकता में क्या संबंध है?

उत्तर: अरस्तू के अनुसार नागरिकता केवल राजनीतिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह नैतिक दायित्व भी है। नागरिक को राज्य के हित में कार्य करना चाहिए और राज्य भी नागरिक को सद्गुणी जीवन जीने में सहयोग करता है। इस प्रकार नागरिकता व्यक्ति के नैतिक विकास का साधन भी है।

प्रश्न 14. अरस्तू की नागरिकता की आलोचना किन आधारों पर की जाती है?

उत्तर: अरस्तू की नागरिकता की आलोचना मुख्यतः तीन आधारों पर होती है—

1. इसमें स्त्रियों और दासों को नागरिकता से वंचित किया गया।

2. यह केवल छोटे नगर-राज्यों तक सीमित रही।

3. यह आधुनिक सार्वभौमिक मानवाधिकारों की भावना से मेल नहीं खाती।

प्रश्न 15. अरस्तू की नागरिकता की आधुनिक महत्वता क्या है?

उत्तर: यद्यपि अरस्तू की नागरिकता सीमित थी, फिर भी इसका आधुनिक महत्व है। उन्होंने नागरिकता को राजनीतिक भागीदारी से जोड़ा, जिसे आज लोकतंत्र की आधारशिला माना जाता है। नागरिकता केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है – यह विचार भी अरस्तू से ही जुड़ा है।

10 नम्बर के प्रश्न:उत्तर

1.    नागरिकता के बारे में अरस्तु की अवधारणा की समीक्षा कीजिए। क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि आज के युग की दृष्टि से उसकी अवधारणा बड़ी अनुदान है।

उत्तर: अरस्तु को राजनीतिक विज्ञान का जनक कहा जाता है। उन्होंने नागरिकता की अवधारणा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रयास किया। उनके अनुसार “नागरिक वही है जिसे न्यायालय एवं सभा में भाग लेने का अधिकार प्राप्त हो।” इस प्रकार उन्होंने नागरिकता को केवल जन्म या निवास से नहीं, बल्कि राजनीतिक अधिकारों एवं सक्रिय भागीदारी से जोड़ा।

 

अरस्तु का मानना था कि राज्य (Polis) एक नैतिक संस्था है और इसका उद्देश्य व्यक्ति को सद्गुणी जीवन प्रदान करना है। राज्य तभी सशक्त होगा जब उसके नागरिक सक्रिय रूप से शासन प्रक्रिया में भाग लें। इस संदर्भ में नागरिकता केवल निजी अधिकारों का उपभोग नहीं, बल्कि सार्वजनिक दायित्वों का निर्वहन भी है। उन्होंने नागरिक और राज्य को एक-दूसरे के पूरक बताया।

अरस्तु ने नागरिकता की परिभाषा में कुछ सीमाएँ भी रखीं। उन्होंने दासों, स्त्रियों और विदेशियों को नागरिकता से बाहर रखा। उनके अनुसार ये वर्ग राज्य की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने में सक्षम नहीं हैं। साथ ही नागरिकता को उन्होंने नगर-राज्य तक सीमित किया। बड़े साम्राज्यों या आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की अवधारणा उनके लिए अप्रासंगिक थी।

अरस्तु की नागरिकता की विशेषताएँ

1. राजनीतिक भागीदारी पर आधारित नागरिकता – केवल वही नागरिक है जो सभा और न्यायालय में निर्णय ले सके।

2. नागरिकता और नैतिकता का संबंध – नागरिकता केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्यों और सद्गुणों का पालन भी है।

3. परिवर्तनशीलता – शासन व्यवस्था बदलने पर नागरिकता की परिभाषा भी बदल जाती है।

4. सार्वजनिक जीवन पर बल – निजी जीवन से अधिक महत्व सार्वजनिक जीवन और राज्य के कार्यों को दिया गया।

अरस्तु की अवधारणा की आलोचना

आज के संदर्भ में अरस्तु की नागरिकता की अवधारणा को कई आधारों पर अनुदार (Illiberal) कहा जाता है:

1. सीमित दृष्टिकोणइसमें स्त्रियों, दासों, कारीगर, मिस्त्री, अन्य भाड़े के व्यक्ति, बदनाम व्यक्ति और विदेशियों को नागरिकता से वंचित किया गया।

2. समानता की कमी – आधुनिक लोकतंत्र में नागरिकता सार्वभौमिक अधिकार है, जबकि अरस्तु ने इसे विशेष वर्ग तक सीमित रखा।

3. नगर-राज्य की सीमा – उनकी अवधारणा छोटे नगर-राज्यों तक सीमित थी, बड़े आधुनिक राष्ट्रों के लिए अनुपयुक्त।

4. मानवाधिकारों की उपेक्षा – अरस्तु ने नागरिकता को राजनीतिक अधिकारों से जोड़ा, जबकि आधुनिक नागरिकता सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों को भी शामिल करती है।

आधुनिक दृष्टि से मूल्यांकन:

यद्यपि अरस्तु की अवधारणा सीमित और अनुदार प्रतीत होती है, फिर भी उसमें कुछ बुनियादी तत्व आज भी प्रासंगिक हैं –

·       नागरिकता केवल अधिकारों का उपभोग नहीं, बल्कि कर्तव्यों का निर्वहन भी है।

·       नागरिकता का आधार राजनीतिक सहभागिता होना चाहिए, यह विचार आधुनिक लोकतंत्र का मूल है।

·       राज्य और नागरिक परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

निष्कर्ष: स्पष्ट है कि अरस्तु की नागरिकता की अवधारणा अपने समय में प्रगतिशील थी, लेकिन आज की दृष्टि से यह सीमित और अनुदार प्रतीत होती है। आधुनिक लोकतंत्र नागरिकता को सार्वभौमिक अधिकार मानता है, जिसमें स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब, स्थानीय-विदेशी सभी को समान अवसर और अधिकार प्राप्त हैं। इस दृष्टि से अरस्तु का विचार आज की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। फिर भी, नागरिकता को राजनीतिक भागीदारी और कर्तव्यों से जोड़ने का उनका योगदान आज भी लोकतंत्र के लिए मार्गदर्शक है।

 

 

 

 

 

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